उत्तर बिहार की राजनीति का गढ़ मुजफ्फरपुर: न ”माई” काम आयी, न ”मुनिया”

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मुजफ्फरपुर : उत्तर बिहार की राजनीति का गढ़ माने जाने वाले मुजफ्फरपुर में एक बार फिर जातीय बंधन की दीवार टूटती नजर आयी. अजय निषाद की ऐतिहासिक जीत ने जेल में बंद रहते हुए चुनाव लड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस की जीत की याद दिला दी. मोदी फैक्टर से जहां एक ओर जातीय समीकरण ध्वस्त […]

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मुजफ्फरपुर : उत्तर बिहार की राजनीति का गढ़ माने जाने वाले मुजफ्फरपुर में एक बार फिर जातीय बंधन की दीवार टूटती नजर आयी. अजय निषाद की ऐतिहासिक जीत ने जेल में बंद रहते हुए चुनाव लड़े समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस की जीत की याद दिला दी.

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मोदी फैक्टर से जहां एक ओर जातीय समीकरण ध्वस्त होते नजर आया, वहीं दूसरी ओर मोदी की विकास को विकास योजनाओं को हर तबके और वर्ग के लोगों ने स्वीकारा है. नतीजा, महागठबंधन का न माई (मुस्लिम-यादव) फैक्टर चला, न ही मुनिया (मुस्लिम-निषाद-यादव) का समीकरण असर दिखा सका.

वर्ष 2014 के आम चुनाव के आंकड़े से साफ हो जाता है कि सभी विधान सभा सीटों पर एनडीए के वोटों में काफी इजाफा हुआ है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी किसी भी विस क्षेत्र में एक लाख के आंकड़े तक नहीं पहुंच सके थे. नगर विधान सभा में सबसे अधिक 94 हजार वोट मिले थे.
वहीं, इस बार गायघाट, औराई, बोचहां, सकरा, कुढ़नी और मुजफ्फरपुर विधान सभा क्षेत्र में एक लाख से अधिक वोट आया है. इसी तरह वैशाली लोकसभा में मोदी लहर में वरिष्ठ समाजवादी नेता डॉ रघुवंश को दूसरी बार पराजय का मुंह देखना पड़ा. 2009 में जब लोकसभा चुनाव हुआ था, तो राजद की पूरे सूबे में करारी हार हुई थी.
लेकिन उस समय भी डॉ रघुवंश यहां से जीतकर संसद तक पहुंचे थे. उसी समय वे मनमोहन सरकार में मंत्री भी बने. लेकिन, इस बार फिर रघुवंश प्रसाद सिंह को अपने जातीय समीकरण से चकमा खाना पड़ा. वे अपने जाति के वोट को भी एकजुट नहीं कर सके. वहीं, दूसरी ओर वीणा देवी ने महागठबंधन के वोट बैंक में भी सेंधमारी कर ली. लिहाजा, राजद के गढ़ रहे इलाकों में भी उन्हें अच्छा वोट मिला.
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