लौह नगरी जमालपुर में खेल की स्थिति बदतर, संसाधनों का घोर अभाव

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जमालपुर : लौह नगरी जमालपुर में विभिन्न खेलों की स्थिति अत्यंत ही बदतर बनी हुई है. मैदान जैसे मूलभूत सुविधा तक नहीं रहने के कारण भी बेशक ही यहां की खेल प्रतिभाओं ने राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना ली हो पर सच्चाई यही है कि न तो राज्य सरकार और न ही जिला या […]

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जमालपुर : लौह नगरी जमालपुर में विभिन्न खेलों की स्थिति अत्यंत ही बदतर बनी हुई है. मैदान जैसे मूलभूत सुविधा तक नहीं रहने के कारण भी बेशक ही यहां की खेल प्रतिभाओं ने राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना ली हो पर सच्चाई यही है कि न तो राज्य सरकार और न ही जिला या नगर प्रशासन द्वारा अबतक इस दिशा में कोई पहल ही की गयी है.

फिर भी जमालपुर के प्रतिभावान खिलाडि़यों ने अपना झंडा बुलंद किया है. इन खेलों में रग्बी फुटबॉल, कबड्डी, हैंडबॉल, फुटबॉल तथा ताइक्वांडो एवं तलवार बाजी शामिल है.रग्बी फुटबॉल के पांच राष्ट्रीय खिलाड़ीजूनियर राष्ट्रीय एथलेटिक्स में तीन बार बाधा दौड़ में अपना परचम लहराने वाला जमालपुर निवासी तथा वर्तमान में जिला रग्बी फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव नरेश कुमार ने बताया कि जमालपुर में रग्बी फुटबॉल का एक भी मैदान नहीं.

फिर भी अपने लगन तथा मेहनत के बल पर इस लौह नगरी के पांच पांच रग्बी खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने में सफल रहे हैं. इन खिलाडि़यों में देव यादव, सुमन कुमार सुमन, प्रेम कुमार, सुमित राज तथा ज्योति रंजन शामिल हैं. उन्होंने बताया कि ये खिलाड़ी रग्बी फुटबॉल की तैयारी अपने बूते ही किया है. रग्बी फुटबॉल का मैदान नहीं रहने के कारण इस खेल के मैच के आयोजन के अवसर पर फुटबॉल मैदान के दोनों गोल पोस्ट को उखाड़ दिया जाता है. तब ये मैच खेल पाते हैं.

जबकि रग्बी फुटबॉल के लिए रग्बी कोर्नर फ्लैग, रग्बी गोलपोस्ट, गोलपोस्ट प्रोटेक्टर, टैकल पैड-हिट शील्ड, टैकल बैग, मारकर कोन, रिवर्जेबल बाइब्स, स्पीड लैडर, मैच बॉल, ट्रेनिंग बॉल सहित अन्य सामग्रियों की आवश्यकता पड़ती है. परंतु सामग्रियों की कौन कहे पूरे मुंगेर जिला में ही रग्बी फुटबॉल के लिए कोई मैदान ही नहीं है.

इस संबंध में बिहार राज्य रग्बी फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव पंकज कुमार ज्योति ने मोबाइल पर बताया कि रग्बी का मैदान फुटबॉल के मैदान से कहीं बड़ा लगभग 120 मीटर लंबा तथा 70 मीटर चौड़ा होना चाहिए. उधर कबड्डी के अंतर्राष्ट्रीय रेफरी कन्हैया तांती ने बताया कि यहां खेल की गतिविधियां राम भरोसे ही है. विद्यालयों में खेल शिक्षक तो हैं,

परंतु खेल का संसाधन नहीं है. न तो मैदान और नहीं खेल सामग्री. प्रशासनिक उदासीनता के कारण यहां के स्कूली बच्चे न तो राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग ले पाते हैं और नहीं महिला महोत्सव या पाइका जैसी प्रतियोगिता में ही. और तो और खेल शिक्षक को विभिन्न विषयों की पढ़ाई करते सहज ही सरकारी विद्यालयों में देखा जा सकता है.फुटबॉल का राष्ट्रीय खिलाड़ी पान बेचने पर मजबूर : मेडल व प्रमाण पत्र दिखाते फुटबॉल खिलाड़ी राकेशजमालपुर : लौह नगरी जमालपुर में खेल एवं खेल प्रतिभा की दुर्गति का जीता जागता उदाहरण राकेश कुमार राउत है.

वह इस्ट कॉलोनी थाना के नयागांव बद्धीपाड़ा का निवासी तथा फुटबॉल का खिलाड़ी है. पिछले दस वर्षों से सक्रिय रूप से इस खेल से जुड़ा हुआ है. इस दौरान वह बिहार राज्य फुटबॉल टीम की ओर से राष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में भाग लेता रहा है.परंतु न तो कोई सरकारी सहायता या न कहीं कोई प्राथमिकता. थक हार कर अपने भाई के पान की गुमटी चला कर अपना जीवन यापन कर रहा है.

फुटबॉल का प्रतिभावान खिलाड़ी राकेश अब तक अनेकों बार बिहार राज्य फुटबॉल चैंपियनशिप में पूर्व रेलवे जमालपुर की ओर से अपनी भागीदारी निभा चुका है.उसने बताया कि वर्ष 2001-02 में 53 वां बिहार राज्य फुटबॉल चैंपियनशिप में उसने पहली बार हिस्सा लिया था. यह आयोजन मुंगेर में ही हुआ था.

इसके बाद गोपालगंज में आयोजित वर्ष 2004-05 में 56 वां, खगडि़या में आयोजित वर्ष 2006-07 में 58 वां, मोतिहारी में वर्ष 2007-08 में आयोजित 59 वां तथा चालू वर्ष 2015 में बांका में 09 से 23 जनवरी तक तक चलने वाले 65 वां बिहार राज्य फुटबॉल चैंपियनशिप में हिस्सा लिया है.

इससे पहले भी वह राजस्थान के जयपुर में आयोजित डॉ बीसी राय ट्रॉफी में बिहार राज्य फुटबॉल एसोसिएशन की ओर से अंडर 19 टीम में खेल चुका है. अंडर 21 का नेशनल भी खेला है. परंतु यहां न तो खेल और नहीं खिलाडि़यों का ही भविष्य सुरक्षित है. उसने बताया कि वह कमजोर महादलित परिवार से है.

पिता की मृत्यु कैंसर से हो जाने के बाद भी आर्थिक तंगी के बावजूद अपने खेल को जिंदा बनाये रखा. परंतु खेल को समर्पित रहने के बावजूद जिंदगी संवारने में खेल ने कोई मदद नहीं की. वह अभी भी इलेवन स्टार एथलेटिक्स क्लब जमालपुर की ओर से खेलता है. अपने मेडल तथा प्रमाणपत्रों को दिखाते हुए कहा कि ये सब आलमारी में रखने की सामग्री मात्र बन कर रह गई है.

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