तारकनाथ वाले कांवरियों की अनोखी भक्ति, सालभर सुल्तानगंज से देवघर तक करते हैं पदयात्रा

Edited by AMIT KR SINHA
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सुल्तानगंज से देवघर की पदयात्रा पर निकले तारकनाथ महादेव के भक्त अपने विशेष कांवर के साथ.

Taraknath Kanwariya Devotion: कड़ाके की ठंड, झमाझम बारिश या चिलचिलाती धूप... कोई मौसम नहीं रोक पाता तारकनाथ के भक्तों की आस्था, कांवर में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं लेकर पहुंचते हैं बाबा बैद्यनाथ धाम.

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असरगंज (मुंगेर) से हिमांशु कुमार सिंह की रिपोर्ट

Taraknath Kanwariya Devotion: श्रावणी मेला और कांवर यात्रा की बात होते ही लाखों शिवभक्तों की तस्वीर सामने आती है, लेकिन सुल्तानगंज-देवघर कांवर पथ पर एक ऐसी टोली भी नजर आती है, जिसकी भक्ति और परंपरा सबसे अलग है. कोलकाता के तारकनाथ महादेव के भक्त साल के बारहों महीने सुल्तानगंज से जल भरकर बाबा बैद्यनाथ धाम तक पदयात्रा करते हैं. इन कांवरियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे अपने कांवर में भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी रखते हैं और पूरी यात्रा आत्मनिर्भर तरीके से पूरी करते हैं.

मौसम चाहे जैसा हो, यात्रा नहीं रुकती

तारकनाथ कांवरिया किसी विशेष महीने या मौसम का इंतजार नहीं करते.कड़ाके की ठंड हो, चिलचिलाती गर्मी या फिर तेज बारिश, उनकी यात्रा लगातार जारी रहती है. सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 105 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा को वे पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ पूरा करते हैं.

असरगंज से गुजर रही 12 युवाओं की एक टोली ने बताया कि उनकी यह परंपरा वर्षों पुरानी है और हर साल हजारों भक्त इसी तरह बाबा बैद्यनाथ पर जलाभिषेक करने निकलते हैं.

Taraknath Kanwariya Devotion: कांवर में साथ चलते हैं देवी-देवता

तारकनाथ कांवरियों की सबसे अलग पहचान उनका विशेष कांवर है. सामान्य कांवरियों की तरह केवल गंगाजल लेकर चलने के बजाय ये भक्त अपने कांवर में विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित करते हैं.

कोलकाता स्थित बाबा तारकनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद यात्रा शुरू की जाती है. श्रद्धालुओं का मानना है कि सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार में पहुंचना उनकी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

जंगल में बनाते हैं भोजन, खुद करते हैं व्यवस्था

इन कांवरियों की यात्रा आत्मनिर्भरता का भी अनूठा उदाहरण है. यात्रा के दौरान वे किसी होटल या भोजनालय पर निर्भर नहीं रहते. रास्ते में उपलब्ध सीमित संसाधनों के बीच स्वयं भोजन तैयार करते हैं.

कांवरिया दिनेश मंडल बताते हैं कि टोली के सदस्य अपने साथ जरूरी खाद्य सामग्री और बर्तन लेकर चलते हैं. जंगल या खुले स्थानों पर लकड़ियां चुनकर भोजन बनाया जाता है और फिर यात्रा आगे बढ़ती है. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है.

आस्था और अनुशासन का अनोखा संगम

तारकनाथ के भक्तों की यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अनुशासन, सामूहिकता और समर्पण का भी प्रतीक है. दिनभर पैदल चलना, स्वयं भोजन बनाना और कठिन परिस्थितियों में भी यात्रा जारी रखना उनकी आस्था की गहराई को दर्शाता है.

श्रावणी पथ पर गुजरने वाले लोग भी इन विशेष कांवरियों को देखकर आकर्षित होते हैं. उनके विशाल और लचीले कांवर यात्रा के दौरान अलग पहचान बनाते हैं.

सालभर जारी रहती है भक्ति की यह परंपरा

कांवरिया दिनेश मंडल के अनुसार कोलकाता के तारकनाथ क्षेत्र से हजारों श्रद्धालु सालभर सुल्तानगंज पहुंचते हैं और गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करते हैं. उनके लिए यह केवल यात्रा नहीं बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठान है.

तारकनाथ कांवरियों की यह अनूठी परंपरा सुल्तानगंज-देवघर कांवर पथ की विविध धार्मिक संस्कृति और गहरी आस्था का जीवंत उदाहरण बन चुकी है.

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