घर में ही गुमनाम हो गये कलागुरु नंदलाल

Published at :03 Dec 2017 5:03 AM (IST)
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घर में ही गुमनाम हो गये कलागुरु नंदलाल

134 वीं जयंती पर विशेष : बापू ने भी नंदलाल बसु को माना था सृजनात्मक कलाकार मुंगेर : मुंगेर के हवेली खड़गपुर में जन्मे नंदलाल बसु ने कला जगत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम तो रोशन किया़ किंतु अपने ही क्षेत्र में नंदलाल धीरे-धीरे विस्मृत हो रहे हैं. मुंगेर के हवेली खड़गपुर में उनके […]

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134 वीं जयंती पर विशेष : बापू ने भी नंदलाल बसु को माना था सृजनात्मक कलाकार

मुंगेर : मुंगेर के हवेली खड़गपुर में जन्मे नंदलाल बसु ने कला जगत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम तो रोशन किया़ किंतु अपने ही क्षेत्र में नंदलाल धीरे-धीरे विस्मृत हो रहे हैं. मुंगेर के हवेली खड़गपुर में उनके निशानी के तौर पर एक आदमकद प्रतिमा है और कुछ भी नहीं. सबसे हास्यास्पद बात तो यह है कि मुंगेर किला परिसर स्थित एक संग्रहालय बनाया गया है.
किंतु इस संग्राहालय में न तो उनके नाम पर कोई कला दीर्घा है और नहीं उनकी कोई कलाकृति ही है़ उनकी जयंती को केंद्र में रखकर मुंगेर जिला स्थापना व मुंगेर महोत्सव बनाया तो जाता है, लेकिन उसमें भी नंदलाल बसु की चर्चा तक नहीं होती है़
जबकि हाल ही में कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में एक करोड़ के सवाल के लिए एक प्रतिभागी से अमिताभ बच्चन ने यह पूछा था कि किस भारतीय चित्रकार ने संविधान चित्र बनाये थे़ उसके जबाव में सही उत्तर में नंदलाल बसु का नाम बताया गया था़ उसके जबाव के तुरंत बाद अमिताभ बच्चन ने यह बताया कि नंदलाल बसु बिहार राज्य के मुंगेर जिले के निवासी थे़
बापू ने भी नंदलाल को माना सृजनात्मक कलाकार
महात्मा गांधी ने नंदलाल बसु के बारे में कहा था कि-‘‘नंदलाल बसु ने मेरी कल्पना को साकार कर दिया है. वे सृजनात्मक कलाकार हैं, भगवान ने मुझे कला का विवेक तो दिया है, लेकिन इसे मूर्त रूप देने का कौशल नहीं दिया है़’’ भारतीय स्वाधीनता और स्वदेशी आंदोलन के प्रति अटूट आस्था रखनेवाले नंदलाल बोस मिट्टी के रंगों और हाथ से बने नेपाली कागज का इस्तेमाल करते थे.
उनके बनाये हजारों चित्र के अलावा उन्होंने शांति निकेतन में जो भित्ति चित्र बनाये, वे सभी मिट्टी के साधारण रंगों से ही बने हैं, जो आज भी अनगिनत भाव व्यक्त करते हैं. भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के आरंभ से ही यूरोपीय कला शैली और कला प्रयोगों के प्रतिरोध में भारतीय कला के पुनर्जागरण में जिन महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों ने सम्पूर्ण सादगी से अपने-अपने कार्यक्षेत्र में प्रतिमान स्थापित किये, उनमें नन्दलाल बसु की अग्रणी भूमिका रही है.
विश्वकला के मंच पर नंदलाल को मिला सम्मान
प्रेरक गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कलागुरू अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रख्यात चित्रकार गगनेन्द्रनाथ ठाकुर के सानिध्य में अपनी कला साधना में निरंतर गति शील नंदलाल ने अपनी परम्परा और धरोहर की श्रेष्ठता को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा और उपादानों तथा उपस्करों का आवश्यकतानुसार उपयोग भी किया, जिनमें भारतीय समाज को नित्य नूतन एवं प्रासंगिक बनाये रखने की क्षमता थी. उनकी कला ने लोक जीवन, श्रृंगारशास्त्र और संगीत से प्रेरणा ली है. नंदलाल बसु के चित्रों में अंकित कोमल, भव्य और मायावी मानव आकृतियों में एक अपूर्व रैखिकीय विशिष्टता वैसी ही प्रत्यक्ष है, जैसी अजंता के चित्रों में देखी जा सकती है.
रंगों के पुट के निपुण वर्गीकरण सुचित्य विभाजन, काल्पनिक असंख्य रूपों की संरचना के कारण समस्त प्रकृति उस जीवन से गूंजने लगती है, जो जीवन अंतनिर्हित है और उसकी लय है. नन्दलाल बसु की कला साधना एवं सर्जना भारतीय कला साधना एवं सर्जना भारतीय कला आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है. इसे केवल बंगाल या भारत के मंच पर ही नहीं, विश्वकला मंच पर बड़े सम्मान के साथ रखा गया है.
कला के दम पर पाये कई बड़े सम्मान
वर्ष 1956 में ‘शिल्प चर्या’ की रचना करने के बाद 16 अप्रैल 1966 को इस महान शिल्पी ने दुनिया को अलविदा कह दिया. नंदलाल बोस को कृतज्ञ राष्ट्र ने ढेर सारे सम्मान दिये. 1950 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट् की उपाधि से नवाजे गये. वर्ष 1952 में विश्वभारती विश्वविद्यालय द्वारा ‘देशिकोत्तम’ सम्मान से, वर्ष 1953 में दादा भाई नैरोजी सम्मान से, वर्ष 1954 में भारत सरकार द्वारा पद्मविभूषण सम्मान से, वर्ष 1957 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट् की उपाधि से, वर्ष 1958 में ललितकला अकादमी द्वारा रजत जयंती पदक, वर्ष 1963 में रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट् की उपाधि से और वर्ष 1965 में टैगोर जन्म शताब्दी पदक से सम्मानित किये गये़ उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया गये थे़
नंदलाल बसु की जन्म भूमि मुंगेर के हवेली खड्गपुर साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘संभवा’ द्वारा उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गयी है. उनके शिष्य बंकिमचंद बनर्जी ने उनकी ही प्रेरणा से भागलपुर में कलाकेन्द्र की स्थापना की और वहां भी उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित है. भारतीय कला को उन्होंने विश्वस्तर पर जो पहचान दिलायी उसे विस्मृत नहीं किया जा सकता है.
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