मिथिला में महत्वपूर्ण देवता हैं सूर्य, छठ व्रत के बाद यहां खेला जाता है सामा चकेबा खेल, जानें

Updated at : 01 Nov 2019 6:10 AM (IST)
विज्ञापन
मिथिला में महत्वपूर्ण देवता हैं सूर्य, छठ व्रत के बाद यहां खेला जाता है सामा चकेबा खेल, जानें

हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ लेखक मधेपुरा में रहते हैं और जाने-माने रचनाकार हैं. सूर्योपासना उत्तर भारत की एक विशिष्ट पूजा है जो अनादि काल से होती आयी है. इस पूजा में वैदिक कर्मकांड नहीं बल्कि स्थानीय फल फूल अनाज तथा पारस्परिक सहयोग से सारे कार्यों का संपादन किया जाता है. कार्तिक मास में उगने वाले फल […]

विज्ञापन
हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ
लेखक मधेपुरा में रहते हैं और जाने-माने रचनाकार हैं.
सूर्योपासना उत्तर भारत की एक विशिष्ट पूजा है जो अनादि काल से होती आयी है. इस पूजा में वैदिक कर्मकांड नहीं बल्कि स्थानीय फल फूल अनाज तथा पारस्परिक सहयोग से सारे कार्यों का संपादन किया जाता है. कार्तिक मास में उगने वाले फल विशेषतः सूर्य को प्रसाद के रूप में चढाए जाते हैं.
लगभग चार हजार वर्ष पूर्व मिस्र के सबसे कम उम्र के राजा अखनाटन ने अपने यहां पशुबलि, नरबलि आदि कुप्रथाओं को समाप्त कर जनता को सूर्योपासना का आदेश दिया था. इस पूजा में भारतीय पूजा की तरह ही नैबेद्ध का विधान था. बिहार मूल रूप से सारे वैदिक-अवैदिक व्रतों का केंद्र रहा है. उसमें मिथिला क्षेत्र तो अग्रगण्य है. मिथिला के लोक जीवन में सूर्य अतिमहत्वपूर्ण देवता हैं. सारी धरती 365 दिनों में सूर्य की परिक्रमा एक बार कर लेती है. इससे यह धरती जीवन पाती है.
मिथिला में छठ व्रत के बाद सामा चकेबा खेला जाता है, मिथिला की ललनाएं रात भर साम चकेबा खेलती है और अपने भाई के सुखी जीवन की कामना करती है.
कार्तिक मास में सूर्योदय की षष्ठी तिथि को जो किरण निकलती है उसका शास्त्र में अधिक महत्व है और उसी के नाम पर यह छठ व्रत संपन्न होता है. यह पूर्णतः आर्यों का त्योहार है. ऋग्वेद में सूर्य की पत्नी ‘उषा’ की वंदना की गयी है. यह सूर्योपासना की प्राचीनता का द्योतक है. मिथिला में तो कोई घर ऐसा नहीं है. जहां इस दिन सूर्य पूजा तथा सूर्य की महिमा के गायन से गुंजायमान नहीं होता.
मिथिला की नारियां सुमधुर कंठों से व्रत के तीसरे दिन संध्या पूजा के दिन रात भर जागरण करती है और सूर्य देवता के गीत गाती है. ‘ जा ग अ है सुरुज देव अरघ क बेरिया’ . यह व्रत सामाजिक समरसता का अभूतपूर्व उदाहरण है. डोम के यहां से कच्चे बांस का सूप लाया जाता है. कुम्हार के यहां से मिट्टी के दीप और ढकनी तथा स्थानीय किसानों के यहां से इस मौसम में उगने वाले फल तथा चावल एवं गेंहू के पकवान बनाये जाते हैं. जो इस धरती की उपज है.
व्रत के पहले दिन भात के साथ कद्दू खाना अनिवार्य है. यह आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर भोजन है, दूसरे दिन पवनैतिन खीर से पूजा करती है इसे ‘खरना’ कहा जाता है. तीसरे और चौथे दिन डूबते और उगते हुए सूर्य की पूजा नदी के तट पर अथवा पोखर के भिंड पर की जाती है. इस प्रकार चार दिनों में उपवास में रहकर इस पूजा को संपन्न किया जाता है.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन