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थर्माकोल की थाली का बढ़ा प्रचलन

Updated at : 21 May 2019 2:40 AM (IST)
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थर्माकोल की थाली का बढ़ा प्रचलन

पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए घातक है थर्माकोल मधुबनी : बीते कुछ साल पहले तक गांव घरों में शादी-विवाह या अन्य अवसरों पर होने वाले भोज, बराती के खाना में केला पत्ता का उपयोग हुआ करता था. गांव घर में किसानों के बगीचे, घर के पीछे से ही लोगों को यह आसानी से मिल जाया […]

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पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए घातक है थर्माकोल

मधुबनी : बीते कुछ साल पहले तक गांव घरों में शादी-विवाह या अन्य अवसरों पर होने वाले भोज, बराती के खाना में केला पत्ता का उपयोग हुआ करता था. गांव घर में किसानों के बगीचे, घर के पीछे से ही लोगों को यह आसानी से मिल जाया करता था.
इससे एक ओर जहां पैसे की बचत होती थी तो इस पत्ते पर खाना खिलाना भी हिंदू धर्म में शुद्ध माना जाता था. आज भी ग्रामीण इलाकों में पूजा पाठ में केला पत्ता का ही उपयोग हो रहा है. पर भोज में अब इसका प्रचलन तो पूरी तरह से समाप्त हो गया है. यह तो बीते गुजरे जमाने की बात लग रही है.
अब तो नयी पीढ़ी को यह विश्वास भी नहीं हो रहा कि लोग केला पत्ता पर खाना खाते थे. अब तो लोगों के खाने, पीने के बर्तन के रूप में भी आर्टीफिशयल थाली, ग्लास, कटोरा ने कप ने ले लिया है. इसमें सबसे अधिक थर्मोकोल से बने बर्तन का प्रचलन हो गया है. तेजी से इसमे बदलाव हुआ है. लोगों ने थर्मोकोल को दैनिक कार्य में शामिल कर लिया है. जहां पहले स्टील व शीशा की ग्लास की अधिक चलन हुआ करता था. अब वह स्थान रेडिमेड से बने थर्मोकोल, सिल्वर पेपर के सामान ने ले लिया है.
सिल्वर पेपर से बनी थाली का बढ़ा क्रेज : थर्मोकोल से बने थाली, ग्लास के जगह पर बीते कुद माह में सिल्वर पेपर से बने प्लेट का उपयोग अधिक हो रहा है. दुकानदार मनोज कुमार बताते हैं कि थर्मोकोल हानिकारक होता है. साथ ही यह मंहगा भी होता है. पर सिल्वर पेपर से बने थाली सस्ता होता है, लोकल स्तर पर भी मिल जाता है. साथ ही सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि यह आसानी से नष्ट हो जाता है.
पांच दर्जन दुकानों में मिलता है थर्मोकोल के सामान : शहर मुख्यालय सहित पूरे जिले भर में करीब पांच दर्जन से अधिक दुकान हैं, जहां पर थर्मोकोल से बने थाली ग्लास का कारोबार हो रह है. इसमेमुख्यालय में दो थौक विक्रेता सहित करीब दो दर्जन दुकान है. जबकि बेनीपट्टी, जयनगर, झंझारपुर, फुलपरास अनुमंडल सहित अन्य क्षेत्रों में भी यह आसानी से मिल जाता है. कारोबारी बताते हैं कि यह पटना, मुजफ्फरपुर, दिल्ली सहित अन्य प्रदेश से आता है.
एक करोड़ का हो रहा कारोबार : थाली, ग्लास के बदलते स्वरूप से थर्मोकोल का कारोबार अब तेजी से फैल रहा है. बाजार से मिली जानकारी के अनुसार सालाना करीब एक करोड़ के आस पास थर्मोकोल से बने सामानों का कारोबार होता है. पर्यावरणविद प्रो.अमर कुमार बताते हैं कि गरम पदार्थ के साथ थर्मोकोल तेजी से प्रतिक्रिया करता है.
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