बिहार : आज भी मधुबनी के हरलाखी में है भगवान श्रीराम का तीर, सदियों से हो रही पूजा अर्चना

Published at :12 Mar 2018 8:59 AM (IST)
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बिहार : आज भी मधुबनी के हरलाखी में है भगवान श्रीराम का तीर, सदियों से हो रही पूजा अर्चना

II रमण कुमार/मनोज II सुरक्षा के इंतजाम नहीं, बांस के सहारे बंधा है तीन हिस्से में चंद्राकार तीर हरलाखी (मधुबनी) : सुनने में लोगों को भले ही अचरज हो या सहज ही विश्वास न हो, पर मधुबनी जिले के हरलाखी में आज भी भगवान श्रीराम का चलाया तीर मौजूद है. लोग आज भी इस तीर […]

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II रमण कुमार/मनोज II
सुरक्षा के इंतजाम नहीं, बांस के सहारे बंधा है तीन हिस्से में चंद्राकार तीर
हरलाखी (मधुबनी) : सुनने में लोगों को भले ही अचरज हो या सहज ही विश्वास न हो, पर मधुबनी जिले के हरलाखी में आज भी भगवान श्रीराम का चलाया तीर मौजूद है. लोग आज भी इस तीर की श्रद्धा से पूजा अर्चना तो कर रहे हैं, पर इसके संरक्षण या देखरेख की पहल नहीं हो रही.
बताया जा रहा है कि चार सौ साल से बांस में बांध कर ही इस देव तीर को लटका कर रखा गया है. उसकी पूजा अर्चना निरंतर जारी है.
जिस स्थल पर भगवान श्रीराम का तीर है, वह स्थल फुलहर गांव के बाग तराई के नाम से जाना जाता है. इस बात की प्रामाणिकता को ले स्थानीय मंदिर के पुजारी से लेकर गांव के बड़े बुजुर्ग के कहने के साथ सदियों से परिक्रमा डोला में देश विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं, विद्वानों की पूजा अर्चना और शास्त्रोक्ति भी है. रामायण में भी बाग तराई का जिक्र गोस्वामी तुलसी दास ने किया है. वर्तमान में एक बांस पर चक्र रूपी धातु है. इसके तीन हिस्से में चंद्राकार तीर बना है.
यह किस धातु से बना है, इसे आज तक न तो परखने की कोशिश की गयी और न ही इस दिशा में पहल. पर खुली हवा, पानी में सदियों से होने के बाद भी इसमें अब तक किसी प्रकार का न तो जंग लगा है और न ही इसके रंग में कोई तब्दिली.
19 वीं पीढ़ी तक का है प्रमाण : फुलहर गिरिजा मंदिर के प्रमुख पंडित उमेश गिरि बताते हैं कि उनकी 19 पीढ़ी इस मंदिर में पूजा अर्चना कर रही है. पीढ़ी दर पीढ़ी इस तीर के बारे में कहा जा रहा है. उनके पूर्वजों ने भी बताया है कि जबसे देखा है यह तीर इसी प्रकार है.
बताते हैं कि तीन तीर तीन अस्त्र का प्रमाण है. इसमें एक ब्रह्मास्त्र, दूसरा दिव्यास्त्र एवं तीसरा पशुपतास्त्र का प्रतीक है. पंडित उमेश गिरि बताते हैं कि हर साल नवमी के दिन नये बांस में इसे पूजा के साथ बांधा जाता है. आस्था यह है कि इस तीर की रक्षा भगवान हनुमान कर रहे हैं. बांस को हनुमान का ध्वजा मान हर दिन पूजा अर्चना की जा रही है.
परिक्रमा डोला के दौरान आये श्रद्धालु करते हैं पूजा : सालों से इस तीर की पूजा होते आ रही है. हर साल विश्व प्रसिद्ध 84 कोसी परिक्रमा में अयोध्या व देश विदेश से आये विद्वान व श्रद्धालु इसी जगह ठहरते हैं. यहीं से परिक्रमा मेला की शुरुआत भी होती है. विधि विधान से इस तीर की पूजा अर्चना की जाती है.
दरभंगा महाराज ने करायी थी जानकी कुंड की खुदाई
बाग तराई के पंडित बिहारी पांडेय बताते हैं कि सालों से वह इस तीर को इसी प्रकार देखते आ रहे हैं. दरभंगा महाराज के समय में ही फुलहर बाग तराई के समीप बने जानकी कुंड की खुदाई करायी गयी थी. इसमें कई प्रकार के सामान निकले थे. इसी में यह चक्र रूपी तीर भी था. उसे स्थानीय लोगों ने दरभंगा महाराज से किसी प्रकार मांग लिया था. तब से आज तक वह इसी प्रकार रखा है.
हां हर साल राम नवमी के दिन इस तीर को उतार कर उसमें घी, सिंदूर लगाया जाता है. नये बांस में ध्वजा बना कर उसे दुबारा लटका दिया जाता है. बताते हैं कि जब इस चक्र रूपी तीर में घी और सिंदूर लगाया जाता है, तो यह सोने की तरह चमकने लगता है.
संरक्षण की होगी पहल
इस तीर के बारे में जिला पदाधिकारी अनभिज्ञ हैं. फुलहर स्थान को पर्यटक क्षेत्र में विकसित करने एवं इसे सहेजने की दिशा में पहल हो रही है. जिला पदाधिकारी शीर्षत कपिल अशोक ने बताया है कि मंदिर के विकास व सौंदर्यीकरण के लिये पर्यटन विभाग ने मंतव्य मांगा है कि इस जगह पर क्या काम किया जा सकता है. वर्तमान में तालाब में घाट निर्माण व मंदिर के सौंदर्यीकरण को प्रस्ताव दिया गया है.
पूर्व में भी पर्यटन विभाग ने इसके विकास के लिये पैसे दिये थे. कुछ काम हुआ भी था. पर अब इसे गंभीरता से लेते हुए पहल की जायेगी. डीएम बताते हैं कि तीर को लेकर उन्हें पता नहीं था. यदि वह तीर इतना पुराना है, तो जरूर ही इसे संरक्षित करने व इसकी सुरक्षा के इंतजाम किये जायेंगे.
राम-सीता विवाह व प्रथम मिलन से जुड़ी है तीर की कहानी
पंडित बिहारी पांडेय बताते हैं कि श्रीराम माता जानकी से शादी करने जनकपुर पहुंचे तो सीता की सखियों ने कहा कि यदि आप वीर हैं तो प्रमाण दें. इसके लिए सखियों ने कहा कि आप तीर के माध्यम से हमें उस स्थल के बार में बतायें जहां आप माता सीता से पहली बार मिले थे. वापस तीर उस जगह से लौट कर आपके पास आ जाये, तो आपकी वीरता को मान लें. भगवान श्रीराम ने सखियों का मन रखने के लिए यह शर्त मान ली.
दूसरी ओर सखियों ने माता सीता से कहा कि आप अपनी सखियों का साथ दें. ऐसा यत्न करें कि श्रीराम द्वारा छोड़ा गया तीर वापस ही न लौटे. यही हुआ. कहा जाता है कि श्रीराम द्वारा छोड़ा गया तीर बाग तराई के समीप बने जानकी कुंड में आया जरूर,पर माता सीता के कारण वह वापस नहीं लौटा. यह वही तीर है. राम सीता के मिलन व उनके जीवन लीला की कहानी का जुड़ाव फुलहर से है, इसका प्रमाण रामायण में भी है.
रामायाण के बालकांड में दोहा 227 में तुलसीदास ने लिखा है कि ”बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत, परम रम्य आराम यहु जो रामहि सुख देत” इससे पहले पंक्ति में लिखा है ” मध्य बाग सर सोह सुहावा, मनि सोपान बिचित्र बनावा, बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा, जलखग कूजत गुंजत भृंगा ”.
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