सब समान त बहि गेल, आब की किछु बचल छी....

Published at :24 Aug 2017 5:12 AM (IST)
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सब समान त बहि गेल, आब की किछु बचल छी....

टूटे घर को दोबारा खड़ा करने की कर रहे जद्दोजहद मधुबनी : तिलयुगा नदी के किनारे बसे धनछीहा पंचायत के अधिकांश गांव बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. यूं कहें कि जिले में सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित इलाकों में से एक. इस पंचायत के करीब एक दर्जन से अधिक गांव बेहाल हैं. बाढ़ का पानी […]

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टूटे घर को दोबारा खड़ा करने की कर रहे जद्दोजहद

मधुबनी : तिलयुगा नदी के किनारे बसे धनछीहा पंचायत के अधिकांश गांव बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. यूं कहें कि जिले में सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित इलाकों में से एक. इस पंचायत के करीब एक दर्जन से अधिक गांव बेहाल हैं. बाढ़ का पानी उतर चुका है. पर इस दस दिन की प्राकृतिक आपदा ने गांववालों की सारी खुशियां छीन ली है. कहीं कोई टूटे घर को दोबारा बनाने की जद्दोजहद कर रहा है, तो कोई घर में पानी की रेत के कारण हो चुके गड्ढे को दुरूस्त करने में जुटा है. कोई चैन से नहीं है. हम अपने सहयोगी के साथ एक बार फिर से बाढ़ से प्रभावित लोंगों का दर्द जानने एक नयी बस्ती में थे.
जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर दूर लौकही प्रखंड का धमौरी, नवका टोल, बगवासा गांव हमारा पड़ाव था. भूतहा चौक तक तो एनएच के जरिये जाने में कोई परेशानी नहीं हुई. धमौली चौक से जैसे ही बाढ़ प्रभावित इलाके के लिये आगे बढ़े टूटी सड़क, सड़क पर बड़े-बड़े गढे, दूर-दूर तक उजाड़ हो चुके बधार, गिरे घर व घर को दुरूस्त करने की जद्दोजहद कर रहे लोग. क्षेत्र में हुए तबाही को बताने के लिये काफी था. कई जगह पर सड़क इस प्रकार टूट गयी है कि बाइक से भी जाना असंभव था. पैदल ही करीब चार किलोमीटर की दूरी तय करइ धमौली गांव पहुंचे.
सड़क किनारे ही कई घर गिरे दिखे. उपेंद्र कामत अपने बेटों के साथ एसबेस्टस के टूटे घर को ठीक करने मे जुटे थे. किसी के हाथ में रिंच-वोल्ट, तो किसी के हाथ में कुल्हाड़ी. सब टूटे घर को जल्द से जल्द ठीक करने की कोशिश कर रहे थे. उपेंद्र बताते हैं कि ‘ बाबू घर में भइर मर्द (एक आदमी के खड़ा होने के बराबर) पईन आईब गेलई. पइन में ततेक करेंट रहई जे घर में मोईन क देलक. सबटा समान ओही मोइन में भसल हई. घर के कुनो कोन नै ठीक बचल छी. एकरा ठीक कर में दू लाख से बेसी रुपैया लगतै. एक पंद्रहों फीट से बेसी गहीर मोइन हइ. एकरा भरइ में कतेको ट्रैक्टर मिट्टी लगतै, से नै पता ”. कहते हैं कि 87 में आयी बाढ़ में भी इतनी तबाही नहीं थी. पानी जरूर आया था. पर इतनी क्षति नहीं हुई थी. इस बार तो बाढ़ नहीं मानों प्रलय थी. हर ओर लोग चीख पुकार रहे थे. कौन किसको देखे. कोइ जब खुद बचे तब तो दूसरे को बचाने की पहल करे. बस्ती का ऐसा कोई परिवार नहीं है जो इस बार की बाढ़ में बरबादी से बचा हो. किसी का घर बह गया, तो किसी के घर के आगे ही मोइन हो गया है. खेती तो एक साथ सबका चौपट है.
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