छोटी मोटी दहक तट पर निमुआ के गाछ, राम!
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :20 Jul 2017 12:56 PM
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मधुबनी : मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व मधुश्रावणी हर्षोल्लास के संग मनाया जा रहा है. सुबह की पावन बेला में जहां पर्व पूजने की जल्दीवाजी व्रतियों व उनके परिजनों में लगी रहती है. वहीं शाम में कथा सुनने एवंसखियों संग फूल लोढने की होड़ लगी होती है. महिला पंडित के द्वारा ही पूजा की सारी रश्म […]
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मधुबनी : मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व मधुश्रावणी हर्षोल्लास के संग मनाया जा रहा है. सुबह की पावन बेला में जहां पर्व पूजने की जल्दीवाजी व्रतियों व उनके परिजनों में लगी रहती है. वहीं शाम में कथा सुनने एवंसखियों संग फूल लोढने की होड़ लगी होती है. महिला पंडित के द्वारा ही पूजा की सारी रश्म कराये जाने के कारण परेशानी भी होती है.
गांव घरों में आज भी एक से दो महिला पंडित ही होती हैं जिन्हें यह कथा आती हो या पूजा कराना जानती हो. इस कारण से पहले पूजा करने को लेकर व्रतियों में मानों शर्त लग जाती है. पूरे निष्ठा व श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना की जाती है. दूध, लाबा, मैना पत्ता, अधिक से अधिक फूल लाने की होड़, चंदन, विल्वपत्र भी तोड़ने की जल्दीवाजी होती है.
दूध लाबा और चना की है प्रचलन
पूरे मधुश्रावणी पूजा में दूध, लाबा और चना प्रसाद में देने और विषहारा को चढ़ाने का प्रचलन रहा है. अपने हाथों से ही घर में धान का लाबा बनाया जाता है. हर रश्म के लिये हर प्रकार के अलग अलग गीत. फिर गीत नाद गाते हुए पूजा करने के दौरान विषहारा को दूध, लाबा व अन्य प्रसाद चढ़ाया जाता है. वहीं हर देवी देवता खासकर भगवान शिव को अधिक से अधिक बिल्वपत्र चढाया जाता है.
जाही जूही से होती है विषहारा की पूजा . मधुश्रावणी में जाही – जूही से माता विषहारा की पूजा की जाती है. शाम में कथा सुनने के बाद व्रती सखियों संग ससुराल से आये वस्त्र व जेवर पहन, सोलहो श्रृंगार कर फूल लोढने निकलती है. इस दौरान व्रती व उनकी सखियां, छोटी बहन जंगल से विभिन्न प्रकार के पत्ते, फूल तोड़कर लाती है. बांस का पत्ता, अरहुल पत्ता, आक (अकौन) का पत्ता विशेष तौर पर तोड़ने की कोशिश होती है. फिर इसी तोड़े हुए पत्ता व जाही जूही से अगले सुबह में विषहारा की पूजा की जाती है. इस दौरान विषहारा के कई प्रकार के गीत भी गाये जाते हैं
” छोटी मोटी दहक तट पर निमुआ के गाछ
राम, ताहि तर पांचो बहिनी झिझरी खेलाय ”
” झिझरी खेलाइते विषहरि के टूटल ग्रिमहार
राम, कनैत खिजैत विषहरि आमा आगा ठाढ ”
” जुनि कानू जुनि खीजू विषहरि दाइ
राम आहू स उत्तम हम गथवा देव ग्रिमहार ”
छठवें दिन हुइ गंगा कथा . बुधवार को छठे दिन गंगा कथा, गौड़ी माता का जन्म, काम दहन की कथा सुनायी गयी. दोपहर में घर में एकत्रित होकर व्रती के साथ साथ आस पास की महिलाएं जमा हुइ. सभी ने छठवें दिन की कथा ध्यान से सुना. इसके बाद सभी फुललोढी को निकली. वहीं सातवें दिन गुरुवार को गौड़ी की तपस्या की कथा सुनायी जायेगी.
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