Bihar News: मधेपुरा के गड्ढेनुमा खेत अब उगल रहे सफेद सोना, मखाना की खेती का तेजी बढ़ रहा दायरा

Published by : Radheshyam Kushwaha Updated At : 10 Jul 2025 8:16 PM

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makhana ki kheti in madhepura

Bihar News: बिहार मधेपुरा जिला के उदाकिशुनगंज अनुमंडल क्षेत्र में मखाना की खेती से किसान समृद्ध हो रहे हैं. अनुमंडल में मखाना की खेती के प्रति किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है. खासतौर पर जिन गड्ढेनुमा खेतों का उपयोग अन्य फसलों के लिए नहीं हो पा रहा था, उनमें मखाना लगाकर किसान अच्छी कमाई कर रहे हैं.

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कौनैन बशीर/Bihar News: मधेपुरा के उदाकिशुनगंज के शहजादपुर, खाड़ा, बुधमा, सिंगारपुर आदि की मिट्टी और जलवायु मखाना की खेती के लिए अनुकूल है. ऐसे तो यहां करीब 10 वर्षों से मखाना की खेती हो रही है, लेकिन हाल के तीन-चार वर्षों से मखाना की ज्यादा खेती हो रही है. अभी करीब पांच सौ हेक्टेयर में मखाना की खेती हो रही है. मखाना किसान मिठ्ठू मंडल, नूरो मंडल, मुसन मंडल, रिजवान आलम सहित अन्य ने बताया कि इसमें मेहनत तो ज्यादा है, लेकिन मुनाफा भी अधिक है. इसलिए मखाना की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. जिन किसानों की जमीन बंजर और जलभराव की वजह से बेकार पड़ी थी, अब वही किसान अपनी बेकार पड़ी जमीन में मखाना की खेती कर खुशहाल जिंदगी बसर कर रहे हैं. बहुत से किसान तो खेत पट्टे पर लेकर मखाने की खेती शुरू कर दिये हैं. उन्हें मखाने की बिक्री के लिए बाजार भी जाना नहीं पड़ता. कारोबारी खुद उनके पास से उपज ले जा रहे हैं. ये सब किसानों की लगन और कड़ी मेहनत से ही मुमकिन हो पा रहा है.

उदाकिशुनगंज में 500 किसान कर रहे मखाना की खेती

जानकार बताते हैं कि शुरुआती दौर में उदाकिशुनगंज में कुछ किसानों ने प्रयोग के तौर पर गड्ढेनुमा खेतों में मखाना की खेती की. इक्के-दुक्के किसानों ने ही दूसरी जगहों से मखाना लाकर इसकी बुआई की थी. कम लागत में अच्छी-खासी आमदनी होने से किसानों का रुझान मखाना खेती की ओर बढ़ता चला गया. अब उदाकिशुनगंज अनुमंडल क्षेत्र में करीब 500 हेक्टेयर भूमि में मखाना की खेती हो रही है. इनमें अधिकांश गड्ढेनुमा बेकार पड़े खेत शामिल हैं. किसानों ने बताया कि आनेवाले समय में मखाना की खेती का रकवा और बढ़ सकता है. इसका कारण मखाना की खेती से अच्छी आमदनी है.

मिथिलांचल में पैदा होने वाले मखाना का बढ़ा दायरा

बिहार के मिथिलांचल में पैदा होनेवाला मखाना अब उदाकिशुनगंज प्रखंड क्षेत्र के सहजादपुर, नयानगर, खाड़ा, बुधमा, लश्करी समेत अन्य पंचायतों के खेतों में भी दस्तक दे दिया है. बढ़ती आबादी और घटते तालाबों और तालों की संख्या के बाद मखाना अनुसंधान संस्थान दरभंगा के कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे अब खेतों में भी मखाना की खेती हो रही है. सहजादपुर पंचायत के चौरी भित्ता के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पर खेतों में साल भर जलजमाव रहता है. ऐसे में इन खेतों में मखाना की खेती करके दर्जनों किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो हो रहे हैं. राजेंद्र सिंह, विनोद मंडल सहित अन्य किसानों ने बताया कि मखाना की खेती के लिए खेत में पानी जमा होना चाहिए.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में मखाना की बहुत ज्यादा मांग

सरकार की तरफ से भी मखाना की खेती को बढ़ावा देने के लिए काम किया जा रहा है. मखाने की देश के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत ज्यादा मांग है. बताया जाता है कि भारत के अलावा चीन, जापान, कोरिया और रूस में मखाना की खेती की जाती है. देश में बिहार के मिथिलांचल और सीमांचल में सबसे ज्यादा मखाना की खेती की जाती है. उदाकिशुनगंज अनुमंडल में बड़ी संख्या में जो तालाब हैं, जिनमें मछली पालन होता है, वहां भी मखाना की खेती की बहुत संभावना है. मखाना की खेती की एक विशेषता यह भी है कि इसमें लागत बहुत कम आती है. इसकी खेती के लिए तालाब या ताल चाहिए या जलजमाव वाले खेत हों.

मखाना उगाने और बनाने की विधि

मखाने के फूल कमल की तरह होते हैं, जो उथले पानी वाले तालाबों में पाये जाते हैं. इसीलिए जलभराव वाले क्षेत्रों या धान के खेतों में भी इसे उगाया जा सकता है. इसकी खेती के लिए तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तथा सापेक्षिक आर्द्रता 50 से 90 प्रतिशत होनी चाहिए. मखाने की खेती के लिए तालाब चाहिए होता है, जिसमें ढाई से तीन फीट पानी होना चाहिए. इसकी खेती में किसी भी प्रकार की खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता. खेती के लिए बीजों को पानी की निचली सतह पर एक से डेढ़ मीटर की दूरी पर डाला जाता है. बुवाई दिसंबर से जनवरी के बीच होती है. बुवाई के बाद पौधों को पानी में ही लगाया जाता है. इसकी पत्ती के डंठल एवं फलों पर छोटे-छोटे कांटे होते हैं. इसके पत्ते बड़े और प्लेटों की तरह गोल-गोल पानी पर तैरते रहते हैं.

जून-जुलाई में हो जाता है तैयार

अप्रैल के महीने में पौधों में फूल लगना शुरू हो जाता है. फूल बाहर नीला और अंदर से जामुनी या लाल और कमल जैसा दिखता है. फूल पौधों पर कुछ दिन तक रहते हैं. फूल के बाद कांटेदार स्पंजी फल लगते हैं, जिनमें बीज होते हैं. यह फल और बीज दोनों ही खाने योग्य होते हैं. फल गोल अंडाकार, नारंगी की तरह होते हैं और इनमें आठ से 20 तक की संख्या में कमलगट्टे से मिलते-जुलते काले रंग के बीज लगते हैं. फलों का आकार मटर के दाने के बराबर तथा इनका बाहरी आवरण कठोर होता है. जून-जुलाई के महीने में फल काटना शुरू कर दिया जाता है.

पोषक तत्वों की बदौलत बढ़ी डिमांड

मखाना में अधिक मात्रा में पोषक तत्व पाये जाने के कारण मांग बढ़ने लगी, तो खेती भी बड़े पैमाने पर होने लगी है. इसमें प्रति 100 ग्राम मखाने में 9.7 फीसद प्रोटीन, 75 फीसद कार्बोहाइड्रेट, आयरन और वसा के अलावा 382 किलो कैलोरी मिलती है. इसमें दूध और अंडे के मुकाबले ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है.

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Radheshyam Kushwaha

लेखक के बारे में

By Radheshyam Kushwaha

राधेश्याम कुशवाहा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से MJ (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत भोपाल से प्रकाशित राज एक्सप्रेस समाचार पत्र से की. इसके बाद उन्होंने समय जगत, राजस्थान पत्रिका और हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं. वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म, अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 13 वर्षों का अनुभव रखने वाले राधेश्याम कुशवाहा को ज्योतिष शास्त्र, पंचांग गणना, ग्रह गोचर, नक्षत्र परिवर्तन, व्रत-त्योहारों की तिथियों तथा शुभ मुहूर्तों का गहन ज्ञान है. अपनी विशेषज्ञता के आधार पर वे धर्म-अध्यात्म और राशिफल से जुड़ी सटीक, तथ्यपरक एवं विश्वसनीय खबरें लिखते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि है. इसके अलावा राजनीति, अपराध और प्रेरणादायक (पॉजिटिव) विषयों पर लेखन में भी उनकी गहरी रुचि है.

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