सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है आलमनगर की काली पूजा

Published at :07 Nov 2015 7:31 PM (IST)
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सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है आलमनगर की काली पूजा

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है आलमनगर की काली पूजा फोटो- आलम काली पूजा 04कैप्शन- मां काली की भव्य प्रतिमा – आलमनगर ड्योढ़ी में होने वाली काली पूजा में हिंदू और मुसलमान मिल कर लेते हैं भाग ब्रजेश, आलमनगर आलमनगर ड्योढी में होने वाली काली पूजा न केवल लोगों की आस्था का केंद्र है बल्कि सांप्रदायिक […]

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सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है आलमनगर की काली पूजा फोटो- आलम काली पूजा 04कैप्शन- मां काली की भव्य प्रतिमा – आलमनगर ड्योढ़ी में होने वाली काली पूजा में हिंदू और मुसलमान मिल कर लेते हैं भाग ब्रजेश, आलमनगर आलमनगर ड्योढी में होने वाली काली पूजा न केवल लोगों की आस्था का केंद्र है बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी है. चूंकि इस वर्ष दस नवंबर को अमावस्या शुरू होने के कारण इसी दिन काली पूजा संपन्न होगी. यहां मां काली की प्रतिमा कार्तिक अमावस्या की शाम में ही स्थापित की जाती है तथा पूरे विधि विधान से प्राण- प्रतिष्ठा कर विशेष पूजा की जाती है एवं इस अवसर पर छप्पन प्रकार के व्यंजनों से भोग लगाया जाता है. भक्तगण पूजा के अवसर पर सैकड़ों क्विंटल मिठाई चढ़ा कर मन्नते मांगते हैं. भक्तों की मन्नते पूरी होने पर मैय्या के सामने छागर की बलि दी जाती है. मशहूर है गाथा1890 मे ब्रिटिश शासन के दौरान पूर्व छय परगना की राजधानी शाह आलमनगर के तत्कालीन राजा नंदकिशोर सिंह के कुछ विश्वासी कर्मचारियों ने लगान का पैसा गबन कर लिया. तब वचन के पक्के राजा नंदकिशोर सिंह ने अपने रियासत के अधीनस्थ नवगछिया के एक साहुकार से लगान चुकाने हेतु कर्ज लेकर ब्रिटिश हुकुमत का धन चुकाया. कर्ज देते हुए साहूकार ने शर्त्त रखी कि अगर पूस के महीने मे कर्ज की रकम नही चुकायी गई तो रियासत साहूकार की हो जाएगी. समय से काफी पहले ही राजा के कर्मचारी कर्ज लौटाने के लिए साहूकार के पास गये, उसके (साहूकार) के मन मे खोट आ गया. और उसने कागज नहीं होने का बहाना बनाकर रकम लेने से इंकार कर दिया. तब राजा ने अपने परिसर ड्योढ़ी स्थित मां काली के मंदिर मे पूजा अर्चना शुरू की एवं मां काली की कृ पा से दूसरे दिन खुद साहूकार की तिजोरी से सारे कागजात गायब हो गये. इसके बाद से ही हर माह की अमावस्या को काली मंदिर मे विशेष पूजा अर्चना एवं छागर की बलि दी जाने लगी. यह परंपरा आज तक कायम है. वहीं कार्तिक अमावस्या केे दिन मां काली की 14 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा बनाकर पूजा अर्चना की जाती है. विशेष व्यंजनों का भोग अमावस्या के दिन मांं काली के प्रतिमा के प्राण-प्रतिष्ठा के उपरांत विशेष व्यंजनों का भोग लगाया जाता है. इसमें छप्पन प्रकार के विशेष व्यंजन सहित मांस, मछली, पूरी, भुज्जा, एवं अपराजिता तथा कनैल के फू ल के बीच संसर्ग करा कर मैथुन उत्पन्न कर पंचमाकार बनाकर विशेष पूजा कर उन्हें अर्पित की जाती है.- सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल – काली पूजा के दौरान सांप्रदायिक सौहार्द स्पष्ट देखने को मिलता है. विसर्जन की रात प्रतिमा निकलने के दौरान सब अपने घरों पर दीये जलाते हैं. वहीं विसर्जन के दौरान जिस पथ से मां काली की प्रतिमा गुजरती है. उधर आतिशबाजियों का सिलसिला देखते ही बनता है. विसर्जन के दौरान लगभग पचास हजार श्रद्धालुओं की भीड़ मां काली की जयघोष करते हुए साथ-साथ चल रही थी. विसर्जन में दूसरे धर्म के लोग भी शामिल होकर सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हैं. पूजा के दौरान मुसलिम समुदाय के लोग भी मंदिर पहुंच कर मां काली की चरणों में नत मस्तक होकर नैवैद्य चढ़ाते हैं एवं दीपावली में दीप प्रज्जवलित करते हैं. कहते हैं कि प्रखंड क्षेत्र के लोग मां काली की झूठी कसमें नहीं खाते हैं.

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