दिघलबैंक के कई गांवों में नहीं है पक्की सड़क

Updated at : 05 Dec 2019 9:01 AM (IST)
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दिघलबैंक के कई गांवों में नहीं है पक्की सड़क

दिघलबैंक : आजादी के 72 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रखंड के कई ऐसे गांव है. जहां के नागरिक मूलभूत समस्या से अबतक नहीं उबर नहीं पाये है. यहां के लोगों से विकास की बात करना केवल सपना दिखाने जैसा है. अभी हर तरफ स्मार्ट सिटी और डिजिटल युग की चर्चा हो रही है […]

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दिघलबैंक : आजादी के 72 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रखंड के कई ऐसे गांव है. जहां के नागरिक मूलभूत समस्या से अबतक नहीं उबर नहीं पाये है. यहां के लोगों से विकास की बात करना केवल सपना दिखाने जैसा है. अभी हर तरफ स्मार्ट सिटी और डिजिटल युग की चर्चा हो रही है लेकिन अब भी प्रखंड में ऐसे क्षेत्र है जहां के लोगों को चलने तक के लिए पक्की सड़क तो दूर, अच्छी कच्ची सड़क भी नहीं है.

जी हां हम चर्चा कर रहे हैं सिंघीमारी पंचायत के पलसा डाकूपाड़ा जाने वाली सड़क की. सिंघीमारी जनता हाट से उत्तर एक किलोमीटर जाने के बाद दुर्गापुर गांव से पश्चिम मुड़ते ही अभी सड़क नहीं सिर्फ रेगिस्तान जैसा नजारा देखने को मिलता है, और बरसात के दिनों में यह पूरा क्षेत्र पानी से भरा रहता है. अभी सुखाड़ के समय में इन गांवों में जाने से पहले लोग हजार बार सोचते है. क्योंकि चारों ओर सिर्फ बालों का ढेर है. उसके बाद कनकई नदी में दो जगहों पर चचरी पुल पाकर ही लोग अपने गंतव्य को पहुंच पाते हैं.
कनकई नदी के उस पार तालटोला पलसा, डाकूपाड़ा, बलुआडांगी, बैजनाथटोला पलसा करीब आधा दर्जन इन गांवों में दस हजार से भी अधिक की आबादी रहती है. इस गांवों में ज्यादातार आदिवासी, महादलित, शेरशावादी सहित अन्य जातियां यहां निवास करता है. 21वीं सदी में भी यहां के लोग 6 महीने नाव पर तो 6 महीने चचरी के पुल एवं रेत पर चलने को मजबूर है.
नेताओं के नजर अंदाज से परेशान ग्रामीण स्थानीय लोगों से बातचीत से पता चला की विधायक को या फिर सांसद ये लोगों को सिर्फ चुनाव में ही इस गांव वालों को याद आता है. चुनाव में लोग आते भी हैं लोगों से वादा भी किया जाता है. पर जैसे ही चुनाव खत्म होती है. फिर इस गांव वालों का हाल जानने कोई नहीं आता.
स्थानीय निवासी तूफान आलम, कमरुलहुदा, महेश शाह, अरुण दास,नजमुद्दीन, साहेब आलम, जाकिर अनवर, शफीक आलम, मंसूर आलम, ताला किस्कु, मोहन सोरेन ने बताया कि गांव अगर किसी को इमरजेंसी हो जाये तो उसे बाहर ले जाना आज भी टेढ़ी खीर है. एक पुल की मांग ग्रामीण वर्षों से कर रहे है जो इस बार लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनेगा.
छात्रों ने बताया तालटोला पलसा, डाकूपाड़ा, बलुआडांगी एवं बैजनाथटोला पलसा से नदी पार कर सिंधीमारी उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने आने वाले छात्र/छात्रों ने अपने बात को रखा.
लोबिन हेंब्रम कक्षा 9 में पढ़ने वाले ने बताया कि बरसात के दिनों में वह 4 महीने विद्यालय नहीं जा पाते हैं. क्योंकि नदी में चारों ओर पानी भर जाता है, और नाव पर चढ़कर जाना प्रत्येक दिन संभव नहीं है.
विनोद मुर्मू कक्षा 9 छात्र ने बताया कि एक तो हम लोगों के गांव में बेहतर शिक्षा के लिए कोई कोचिंग सेंटर भी नहीं है, हम लोग सिर्फ स्कूल के भरोसे ही अपनी पढ़ाई कर पाते हैं. मगर रोज इन बालू के ढेड़ पर चल कर विद्यालय जाना बड़ा कठिन हो जाता है.
छात्र विष्णु मुर्मू बताते हैं कि हम लोग गरीबी को अपने घर में देखा है. परिजन कहते हैं कि पढ़ लिखकर अपना भविष्य बेहतर करो. पढ़ने की आस भी बहुत है मगर रेत का पहाड़ और पानी तैकर कर स्कूल जाना बड़ा मुश्किल है.
छात्र अजीत कुमार सिंह बताते हैं अभी हर क्षेत्र में इतना कंपेटीशन हो गया है. ऐसे में नियमित विद्यालय ना हो तो फिर पास होना भी बड़ा मुश्किल है.
भारती कुमारी कक्षा 9 में पढ़ती है. उसने बताया कि विद्यालय तो गांव से नजदीक ही है. मगर जाने वाला रास्ता बहुत कठिन है. जिस कारण हम लोग प्रत्येक दिन स्कूल नहीं जा पाते हैं. लंबा बालू का मैदान फिर चचरी पारकर विद्यालय पहुंचना, मन में एक डर सा लगा रहता है.
पार्वती कुमारी बताती है गांव से विद्यालय जाने वाले इन सड़क के नाम पर सिर्फ बालू का मैदान और दो जगहों पर चचरी के पुल पाड़ करना पड़ता हैं. जिस पर दिन में भी चलने से बड़ा भव्य सा लगता रहता है. ऐसे में विद्यालय पहुंचकर अपनी पढ़ाई पूरी करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है.
घाट का प्रत्येक वर्ष होता है डाक
स्थानीय लोगों ने बताया नदी घाट का प्रशासन की ओर से प्रत्येक वर्ष डाक होता है. ठेकेदार द्वारा यहां से मोटी रकम भी वसूलते हैं. मगर सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिलता. बरसात के दिनों में नाव पर चढ़ने के भी पैसे लगते हैं. और अभी चचरी फुल पार करने की भी पैसे देने पड़ते है. गांव के बहुत ऐसे परिवार हैं जो इन नाव और चचरी का भाड़ा मासिक किस्त में भरते है.
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