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मिट्टी के घरौंदे हो रहे हैं गुमनाम, आधुनिकता के चकाचौंध में गुम हो रही है हमारी परंपरा

Updated at : 18 Oct 2025 10:33 PM (IST)
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मिट्टी के घरौंदे हो रहे हैं गुमनाम, आधुनिकता के चकाचौंध में गुम हो रही है हमारी परंपरा

मिट्टी के घरौंदे हो रहे हैं गुमनाम, आधुनिकता के चकाचौंध में गुम हो रही है हमारी परंपरा

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गोगरी. दीपावली का पर्व रोशनी, उल्लास और रिश्तों को जोड़ने का पर्व है, लेकिन इसी रोशनी के बीच एक परंपरा धीरे-धीरे गुम होती जा रही है. वह है मिट्टी का घरौंदा बनाना. कभी दीपावली से पहले बच्चे मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाकर उन्हें रंगते, सजाते और दीपों से जगमग करते थे. पर आज यह दृश्य लगभग गायब हो गया है. कभी गांव और कस्बों में बच्चे अपने माता-पिता व दादी-नानी की मदद से आंगन में घरौंदा बनाते थे. तुलसी चौरा, छोटी सी सीढ़ी, रंगीन दीवारें और मिट्टी की महक दीपावली के असली उत्सव का हिस्सा होती थीं. माना जाता था कि देवी लक्ष्मी स्वच्छ और आत्मीय घर में ही प्रवेश करती हैं, इसलिए मिट्टी का घरौंदा उनके स्वागत का प्रतीक था. मिट्टी में समाती जा रही है यह परंपरा अब यह परंपरा मिट्टी में समाती जा रही है. आधुनिक जीवनशैली, फ्लैट संस्कृति और बच्चों की डिजिटल व्यस्तता ने मिट्टी से रिश्ता तोड़ दिया है. अभिभावक भी अब बच्चों को इन गतिविधियों से दूर रखते हैं. बाजारों में मिलने वाली रेडीमेड लाइटें, प्लास्टिक के घर और कृत्रिम सजावट ने घरौंदे की जगह ले ली है. बच्चों के हाथ अब मिट्टी से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से सने हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि घरौंदा बनाना सिर्फ मनोरंजन नहीं था, बल्कि यह बच्चों के रचनात्मक विकास, टीम वर्क और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक था. इससे बच्चे प्रकृति के करीब आते थे और परंपराओं को आत्मसात करते थे. उम्मीद है अभी बांकी फिर भी उम्मीद बाकी है. यदि विद्यालयों में घरौंदा निर्माण प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा आयोजन और अभिभावकों का थोड़ा समय बच्चों के साथ बिताना शुरू हो जाए, तो यह परंपरा फिर से जीवित हो सकती है. इस दीपावली, जरूरत है कि हम फिर से मिट्टी से रिश्ता जोड़ें. घरौंदे के उस छोटे से घर में दिया जलाकर अपनी परंपरा को रोशन करें. ताकि दीपावली की रोशनी हमारे संस्कृति तक भी पहुंचे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJKISHORE SINGH

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