न डॉक्टर, न ही दवा की सुविधा

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अनदेखी. चैनपुर व हाटा के पशु अस्पताल बने शोभा की वस्तु चैनपुर व हाटा का पशु अस्पताल सिर्फ नाम का पशु अस्पताल हैं. न ही समय पर वहां डॉक्टर मिलते हैं और न ही कर्मचारी. चैनपुर पशु अस्पताल के पास तो अपना भवन हैं. लेकिन, हाटा का पशु अस्पताल किराये के मकान में चलता है. […]

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अनदेखी. चैनपुर व हाटा के पशु अस्पताल बने शोभा की वस्तु
चैनपुर व हाटा का पशु अस्पताल सिर्फ नाम का पशु अस्पताल हैं. न ही समय पर वहां डॉक्टर मिलते हैं और न ही कर्मचारी. चैनपुर पशु अस्पताल के पास तो अपना भवन हैं. लेकिन, हाटा का पशु अस्पताल किराये के मकान में चलता है. चैनपुर में एक डॉक्टर प्रखंड में कार्यरत हैं. लेकिन, समस्या यह हैं कि उनके पास प्रखंड के काम के साथ-साथ छह पशु अस्पतालों के प्रभार है. उसी प्रभार में से दो चैनपुर व हाटा का पशु अस्पताल भी है.
भभुआ (ग्रामीण) : चैनपुर व हाटा का पशु अस्पताल अपनी कहानी स्वयं कहता है. चैनपुर पशु अस्पताल के पास भवन तो है. लेकिन, हाटा का पशु अस्पताल भवन विहीन हैं. चैनपुर प्रखंड कार्यालय में एक पशु डॉक्टर तो हैं, लेकिन उनकी समस्या अजीबो-गरीब हैं.
डॉक्टर एक, प्रभार छह पशु अस्पतालों का. पशुपालक चैनपुर का पशु अस्पताल देख कर तो खुश होते हैं, पर वहां की दुर्दशा से जब अवगत होते हैं तो उन्हें अपने पशुपालक होने पर रोना आता हैं. सरकार द्वारा पशुपालकों के लिए एक से बढ़कर एक वायदे किये जाते हैं पर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है, जिस अस्पताल के पास भवन नहीं है उसकी हालत और जिसके पास भवन हैं उसकी हालत में कोई खास फर्क नहीं हैं. भवन होने व नहीं होने का कोई मतलब नहीं होता जब उस भवन की उपयोगिता ही न हो. भवन तो है पर डॉक्टर के उपलब्धता की न तो कोई समय सारणी हैं और नहीं दवाओं का कोई इंतजाम. पशुपालक अपनी परेशानियों का रोना रोते हैं और डॉक्टर व कर्मचारी अपनी मजबूरी सुनाते हैं. पशुपालक को अपने बीमार पशुओं के इलाज की चिंता सताती हैं और डॉक्टर कहां जाये उन्हें खुद समझ में नहीं आता. पशुपालकों में हमेशा सोच बनी रहती हैं कि अस्पताल में जायें तो वहां जाकर क्या करें. वहां न दवा है और न ही कोई स्टाफ.
मवेशियों का नहीं हो पाता इलाज
एक तरफ जहां पशुपालन के क्षेत्र में नयी-नयी योजनाएं बन रही हैं. किसानों को पशुपालन के क्षेत्र में रोज नये-नये पाठ पढ़ाये जा रहे हैं. पशुपालन के क्षेत्र में प्रशिक्षण दिये जा रहें हैं.
वहीं, पशुपालक के साथ क्या बीत रहा हैं यह देखना दिलचस्प होगा. अपनी गाढ़ी कमाई या सरकार की योजनाओं से पशुपालक महंगी व अच्छी नस्ल की दुधारू मवेशियों को खरीदते हैं और उसे अपना व्यवसाय समझ कर दिन रात मेहनत करके अपना व अपने परिवार के भरण-पोषण का माध्यम समझता हैं और दिन- रात उनकी सेवा कर दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र मे कुछ कर गुजरने की उम्मीद लेकर अपना सर्वस्व जीवन का समय उस रोजगार के लिए देना चाहता हैं. वह पशुपालक ज्योंही अपने कार्य में कुछ दूरी तय करते हैं तब तक उसके कोई न कोई मवेशी बीमार पड़ जाते हैं और समय पर उचित इलाज नहीं मिलने पर दम तोड़ देते हैं. ऐसे में पशुपालक की कमर टूट जाती है और उसका व्यवसाय चौपट हो जाता हैं.
पशुपालक कहीं का नहीं रह पाता. पछतावा के सिवा उसके पास कोई चारा नहीं बचता लाचार पशुपालक अपनी लाचारी व बेबसी की कहानी किस- किस को सुनाये न तो सरकार उसकी परेशानी को समझने वाली हैं और न ही प्रशासन. अंत में थक-हार कर पशुपालक अपनी किस्मत की दुहाई देकर या तो संतोष कर लेते हैं या फिर मानसिक परेशानी में पड़ जाता हैं और उसके बाल-बच्चे रोड पर आ जाते हैं.
अस्पताल में लटका रहता है ताला
चैनपुर व हाटा के पशु अस्पताल में चैनपुर के पास तो अपना भवन हैं पर हाटा में किराये के मकान में अवस्थित हैं. चैनपुर के पशु अस्पताल का भवन पशुपालकों के सिर्फ देखने की चीज रह गयी है. क्योंकि वहां कभी पशुपालक अपने पशुओं का इलाज नहीं करा पाते हैं और हाटा के पशुपालक सिर्फ पशु अस्पताल का बोर्ड देख कर संतोष कर लेते हैं. बहुत से पशुपालकों को कभी याद भी नहीं हैं कि उन्होंने कभी पशु अस्पताल का लाभ लिया हो. इलाज की कौन कहे समय-समय पर पशुओं को मौसमी बीमारी से बचाने के लिए सरकार की योजना जो टीकाकरण की हैं उस योजना का लाभ भी कभी अस्पताल के माध्यम से पशुपालकों को नहीं मुहैया करायी गयी हैं.
कभी भुला भटका कोई पशुपालक अपने बीमार पशुओं को लेकर पशु अस्पताल में आ जाता हैं तो अस्पताल में ताला लटका रहता है. खुला भी है तो कोई दवा नहीं हैं. सिर्फ एक व्यक्ति चाहे उसे डॉक्टर कह लें या लिपिक. अकेला बैठा रहता है.पशुपालक अपने बीमार पशुओं को लेकर दर-दर की ठोकर खा रहें हैं. एक तरफ जहां पशुपालन के क्षेत्र मे रोजगार तलाशने की बात किसानों व युवकों को दिवास्वप्न दिखाये जाते हैं.
वही, जब किसान पशुपालन को अपना रोजगार बना लेते हैं और उनके पशु जब बीमार हो जाते हैं तो सरकार के पशुपालन विभाग द्वारा कोई मदद नहीं की जाती हैं. बेचारे पशुपालक अपने बीमार पशुओं को लेकर यत्र-तत्र भटकने पर मजबूर हो जाते हैं और बेबस होकर सरकार व पशुपालन विभाग को कोसते हैं.
क्या कहते हैं जिला पशुपालन पदाधिकारी
डॉक्टरों व कर्मचारियों की कमी से सारी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं. समय- समय पर दवाओं की उपलब्धता नहीं हो पाती हैं. विभाग में उपलब्ध संसाधनों द्वारा पशुपालकों की समस्याओं का निदान किया जाता हैं.
अनूप कुमार राय, जिला पशुपालन पदाधिकारी
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