संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा
Updated at : 30 Mar 2019 7:50 AM (IST)
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जहानाबाद : शहर के निजी अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल कचरे को अन्य कूड़े के साथ खुले में ही फेंक दिया जा रहा है, जिससे सफाई कर्मचारियों, आमलोगों और जानवरों की जान को खतरे की आशंका है. नियमानुसार अस्पतालों से प्रतिदिन निकलनेवाले मेडिकल कचरे को उचित प्रक्रिया के तहत नष्ट कराना चाहिए पर अधिसंख्य निजी […]
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जहानाबाद : शहर के निजी अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल कचरे को अन्य कूड़े के साथ खुले में ही फेंक दिया जा रहा है, जिससे सफाई कर्मचारियों, आमलोगों और जानवरों की जान को खतरे की आशंका है.
नियमानुसार अस्पतालों से प्रतिदिन निकलनेवाले मेडिकल कचरे को उचित प्रक्रिया के तहत नष्ट कराना चाहिए पर अधिसंख्य निजी नर्सिंग होम द्वारा ऐसा नहीं हो रहा है. नर्सिंग होमों से रोजाना इंजेक्शन, सीरींज, ग्लूकोज की बोतल, दस्ताने सहित कई तरह के मेडिकल वेस्ट निकलते हैं. इससे इंसिनेटर मशीन द्वारा नष्ट करने का सख्त नियम है लेकिन शहर के किसी भी निजी अस्पताल में इंसिनेटर मशीन नहीं है.
हालांकि सदर अस्पताल में मेडिकल वेस्ट के निष्पादन के लिए एक एजेंसी की सेवा ली जा रही है लेकिन अधिसंख्य प्राइवेट अस्पताल इस प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं. इन अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल कचरे को अन्य कचरे के साथ नदी में या खाली जमीन में फेंक दिया जाता है. वहीं कुछ अस्पतालों से नगर पर्षद के सफाई कर्मी उठाकर ले जाते हैं.
अनुमान के अनुसार एक नर्सिंग होम से प्रतिदिन प्रति बेड करीब एक किलोग्राम मेडिकल कूड़ा निकलता है, जिसमें से 10-15 प्रतिशत अत्यंत घातक और संक्रामक होता है. जिनके संपर्क में आने से सफाई कर्मचारियों या जानवरों को जान के लाले पड़ सकते हैं.
नियमानुसार इस तरह के कूड़ों को थैलों में उठाकर ले जाना होता है और सफाई कर्मचारी के हाथों में दस्ताने होने चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. सफाई कर्मचारी या अस्पताल कर्मी अपनी जान जोखिम में डाल नंगे हाथों से मेडिकल कूड़े का उठाव करते हैं.
क्या है नियम : भारत सरकार के बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग रूल्स 1998 के अनुसार सभी अस्पतालों, क्लिनिकों, जांच घरों, ब्लड बैंकों, पशु अस्पतालों आदि संस्थान में मेडिकल कचरे को निष्पादित करने के लिए मशीनें और इंसिनेटर लगाने जरूरी है. इसके लिए सभी चिकित्सकों संस्थानों को संबंधित विभाग से सर्टिफिकेट भी लेना आवश्यक है.
सर्टिफिकेट न होने की स्थिति में अस्पतालों का लाइसेंस रद्द भी किया जा सकता है लेकिन अधिसंख्य निजी नर्सिंग होमों में नियमों को ताक पर रखकर कूड़े का उठाव किया जा रहा है. वहीं प्रशासन द्वारा भी आज तक कोई जांच या कार्रवाई नहीं की गयी है.
अलग-अलग रंग के थैलों में रखना होता है मेडिकल कचरा : अलग-अलग प्रकार के मेडिकल वेस्ट को अलग-अलग रंग के थैलों में डाला जाता है. पीले रंग के थैले में शरीर के अंग, लैब सैंपल, खून लगी सामग्री रखे जाते हैं. वहीं लाल रंग के थैले में दस्तानों, कैथेटर, कल्चर प्लेट आदि को रखा जाता है.
प्लास्टिक बैग, सूई कांच के टुकड़े, गत्ते के डिब्बे को नीले या सफेद रंग के थैले में रखना होता है. वहीं बेकार और उपयोग की गयी दवाइयों को काले रंग के थैले में रखकर जमा करना होता है जिसे नष्ट करने के लिए इंसिनेटर मशीन या मेडिकल कूड़ा उठाने वाली एजेंसी को देना जरूरी है.
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