हिंदी जन-गण-मन की भाषा, लिखने बोलने व पढ़ने में हमें होना चाहिए गर्व : कामदेव

14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी गयी थी तभी से हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मानते हैं.
सोनो. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी गयी थी तभी से हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मानते हैं. रविवार को प्रखंड के शिक्षाविद चुरहेत निवासी कामदेव सिंह ने हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की अपील की है. उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी राज भाषा है, लेकिन इसे राष्ट्र भाषा होनी चाहिए. अपने ही देश हिंदुस्तान में हिंदी की उपेक्षा पर अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कामदेव सिंह ने कहा कि आज हिंदी अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि अंग्रेजी का जुनून लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है. जिस अंग्रेजी भाषा को भारत में नौकरानी बनकर रहना चाहिए वह आज पटरानी बन बैठी है. देश की कुल आबादी के 40 प्रतिशत से भी अधिक लोग हिंदी बोलने वाले हैं और जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और अरुणाचल प्रदेश से लेकर गुजरात तक हर जगह हिंदी कम या ज्यादा बोली और समझी जाती है. वास्तव में हिंदी जन गण व मन की भाषा है. हिंदी भारत माता के माथे की बिंदी है. हिंदी भाषा को आत्मसात किए बिना एक मजबूत राष्ट्र की बात बेमानी है. हमें हिंदी भाषा को उपेक्षा से उबारने का संकल्प लेना होगा. दुख इस बात का है कि हिंदी दिवस पर आज सिर्फ औपचारिकता पूरी की जाती है. विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में कार्यक्रम होंगे और एक दिन के परिचर्चा के बाद लोग अपनी जिम्मेदारी पूरा समझकर हिंदी को अपने हाल पर ही छोड़ देंगे. 1950 में जब भारत का संविधान लागू हुआ तब यह कहा गया था कि 15 वर्षों के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दे दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और हिंदी राजभाषा बनकर ही रह गयी. हमारी जिम्मेदारी है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हम काम करें. हमें अपने बच्चों को हिंदी के प्रति जागरूक करना होगा और उन्हें हिंदी लिखने पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा. कार्यालय में भी हिंदी में कार्य निबटाने होंगे. हिंदी लिखने पढ़ने और बोलने पर हमें गर्व होना चाहिए. हिंदी मात्र एक भाषा ही नहीं वास्तव में यह भारत की परिभाषा भी है.
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