अंग्रेजों से बचने वाया नदी में कूदे, पिता ने दी शहादत, फिर भी नहीं छोड़ा आंदोलन, जानिए गोरौल के इस स्वतंत्रता सेनानी की कहानी

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स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र का फाइल फोटो

Pandit Vindhyeshwari Prasad Mishra : महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने गांधीजी के आह्वान पर देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। स्वतंत्रता संग्राम के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में पाँच एकड़ जमीन दान कर विद्यालय की स्थापना की।

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Pandit Vindhyeshwari Prasad Mishra : हाजीपुर के गोरौल प्रखंड के सतपुरा गांव में जन्मे महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र को आज भी लोग सम्मान के साथ याद करते हैं. महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने घर छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी फौज से सीधा मुकाबला किया. स्वतंत्रता संग्राम के बाद उन्होंने शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया.

गांधी जी के आह्वान पर घर छोड़ आंदोलन में कूदे

गोरौल प्रखंड के कटरमाला पंचायत से सटे सतपुरा गांव में राम परीक्षण मिश्र के घर जन्मे पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते थे. गांधी जी के आह्वान से प्रभावित होकर उन्होंने घर छोड़ दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए.

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1942 में रेलवे लाइन उखाड़ने पहुंचे थे

वर्ष 1942 के आंदोलन के दौरान पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय कैप्टन जय नारायण निषाद के बड़े भाई स्वर्गीय राम नारायण सहनी के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ कार्रवाई की. दोनों गोरौल-भगवानपुर रेलवे स्टेशन के बीच बेलवर गांव के पास वाया नदी पर बने रेलवे पुल की रेलवे लाइन उखाड़ने पहुंचे थे.

अंग्रेजी फौज ने अचानक बोल दिया धावा

बताया जाता है कि रेलवे लाइन उखाड़ने के दौरान अचानक अंग्रेजी फौज वहां पहुंच गई और गोलीबारी शुरू हो गई. इस दौरान एक गेटमैन की गोली लगने से मौत हो गई. स्थिति बिगड़ने पर पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र अपनी जान बचाने के लिए पानी से भरी वाया नदी में कूद गए.

पिता भी अंग्रेजों से भिड़े, जख्मी होकर हुई मौत

इसके बाद अंग्रेजी फौज उनके घर की ओर बढ़ रही थी. रास्ते में उनकी मुलाकात उनके पिता राम परीक्षण मिश्र से हो गई. अंग्रेज अधिकारियों को जब पता चला कि क्रांतिकारी विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र उनके पुत्र हैं, तो उन्होंने राम परीक्षण मिश्र पर भी हमला कर दिया. उन्होंने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया, लेकिन इस संघर्ष में गंभीर रूप से घायल हो गए.

मुजफ्फरपुर में इलाज के दौरान पिता ने दम तोड़ा

गंभीर रूप से घायल राम परीक्षण मिश्र को इलाज के लिए मुजफ्फरपुर ले जाया गया. इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. पिता की मृत्यु के बाद भी पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने स्वतंत्रता आंदोलन का रास्ता नहीं छोड़ा और देश की आजादी के लिए संघर्ष जारी रखा.

आजादी के बाद शिक्षा को बनाया सेवा का माध्यम

स्वतंत्रता आंदोलन के बाद पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उन्होंने पांच एकड़ जमीन दान कर अपने माता-पिता के नाम पर श्री रामपरीक्षण चन्द्रज्योति उच्च विद्यालय बेलवर घाट की स्थापना में योगदान दिया. यह विद्यालय अब इंटर स्तर तक संचालित हो रहा है.

गांव में दो मध्य विद्यालयों के लिए भी जमीन दान

उन्होंने अपने गांव में दो मध्य विद्यालयों के भवन निर्माण के लिए जमीन दान की. इसके अलावा एलएन कॉलेज भगवानपुर और बुनियादी विद्यालय वारिसपुर की स्थापना में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान बताया जाता है.

न्यायिक निष्पक्षता के कारण बने लोक अदालत के पहले अध्यक्ष

पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र की न्यायिक निष्पक्षता और सामाजिक प्रतिष्ठा को देखते हुए वैशाली जिले में गठित लोक अदालत का उन्हें पहला अध्यक्ष बनाया गया था. इस भूमिका में भी उन्होंने निष्पक्षता को प्राथमिकता दी.

सरकार ने 'किसान श्री' सम्मान से नवाजा

स्वतंत्रता सेनानी पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र को राज्य सरकार की ओर से 'किसान श्री' सम्मान से सम्मानित किया गया था. स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के साथ कृषि और सामाजिक क्षेत्र में उनके काम को भी सम्मान मिला.

स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से किया इनकार

पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र और उनकी पत्नी दोनों स्वतंत्रता सेनानी थे. इसके बावजूद उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मिलने वाली पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इनकार कर दिया था. उनके लिए देश सेवा सम्मान और कर्तव्य का विषय था.

17 जनवरी 2021 को हुआ निधन

लंबे जीवन में स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में योगदान देने वाले पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र का निधन 17 जनवरी 2021 को हुआ. उनके जाने के बाद भी गोरौल और वैशाली में उनके योगदान की यादें लोगों के बीच बनी हुई हैं.

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सुधीर कुमार झा

लेखक के बारे में

By सुधीर कुमार झा

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