राजनीति से दूर रहे बड़े धुरंधर होंगे आमने-सामने!

Published at :20 Feb 2016 12:20 AM (IST)
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राजनीति से दूर रहे बड़े धुरंधर होंगे आमने-सामने!

– कुटियां पंचायत में माले दे सकती है कड़ी टक्कर भोरे : नयी आरक्षण नीति ने पंचायत चुनाव में कई बड़े उलटफेर कर दिये हैं. ऐसे में वर्षों से राजनीति से दूर हुए बड़े धुरंधर एक बार फिर लंबे अरसे के बाद एक दूसरे के आमने-सामने होंगे. ऐसे में यह चुनाव कुछ पंचायतों में काफी […]

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– कुटियां पंचायत में माले दे सकती है कड़ी टक्कर

भोरे : नयी आरक्षण नीति ने पंचायत चुनाव में कई बड़े उलटफेर कर दिये हैं. ऐसे में वर्षों से राजनीति से दूर हुए बड़े धुरंधर एक बार फिर लंबे अरसे के बाद एक दूसरे के आमने-सामने होंगे. ऐसे में यह चुनाव कुछ पंचायतों में काफी रोचक होगा. इसके लिए अभी से पूरी ताकत झोंकी जा रही है. लेकिन, बदले स्वरूप में किसी की भी राह आसान नहीं होगी. कुछ ऐसा ही हाल है विजयीपुर प्रखंड की कुटियां पंचायत का, जहां इस बार के चुनाव में जहां राय परिवार की प्रतिष्ठा दावं पर लगी है, तो वहीं उनके हाथों से सत्ता छीन लेने के लिए कई लोग मैदान में ताल भी ठोक रहे हैं.

इसलिए इस बार के चुनाव में कुटिया पंचायत में मुखिया पद के लिए संघर्ष कड़ा होगा. बता दें कि बिहार में जब पंचायती राज लागू हुआ तब छितौना पंचायत (अब कुटिया) के पहले मुखिया बने राजबल्लम राय. इनके हाथों में पंचायत की बागडोर जनता ने लगातार 1978 तक रहने दी. 1978 में हुए चुनाव में एक बड़ा बदलाव हुआ, जिसमें अयोध्या यादव ने राजबल्लम राय को हरा कर उनसे सत्ता छीन ली. लंबे समय के बाद वर्ष 2001 में जब त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की घोषणा हुई, तब छितौना पंचायत का अस्तित्व समाप्त कर उसके बदले कुटिया पंचायत बनायी गयी.

वर्ष 2001 में हुए चुनाव में गांव की सरकार की कमान एक बार फिर राय परिवार के गिरीश राय के हाथों में चली गयी. वर्ष 2006 में पंचायत के आरक्षण में बदलाव किया गया और मुखिया सीट अतिपिछड़ा महिला के लिए आरक्षित हो गयी. 2006 में पंचायत की पहली महिला मुखिया बनी मुरली देवी. 2011 में मुरली देवी के हाथों से सत्ता की बागडोर पहली बार माले कार्यकर्ता सुभावती देवी के हाथों में चली गयी.

यहां बताना आवश्यक है कि राय परिवार की बादशाहत सिर्फ छितौना पंचायत तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि छितौना के मुखिया रहे राजबल्लम राय के बड़े भाई नंदकिशोर नारायण राय मुशेहरी पंचायत के मुखिया थे, जिन्हें एक बार शारदा नंद सिंह ने हराया था.

यहां गौर करनेवाली बात यह है कि उसी राय परिवार के गिरीश राय ने वर्ष 2001 में शारदा नंद सिंह को हरा दिया था. ऐसे में इस बार के चुनाव में जहां गिरीश राय की पत्नी रीना राय चुनावी मैदान में है, तो वहीं शारदानंद सिंह के परिजन भी उन्हें चुनौती देने के लिए मैदान में हैं. माले इस बार भी पंचायत की सत्ता अपने हाथों से जाने नहीं देना चाहती.

इसे लेकर इस बार माले नेता श्रीराम सिंह के परिजन भी चुनाव को रोचक बनाने में मैदान में उतरने को बेताब हैं. गांव की सरकार इस बार कौन बनायेगा यह तो जनता ही तय करेगी.

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