एमए, बीए से महंगी है क, ख, ग की पढ़ाई, री-एडमिशन और अन्य शुल्क की मार से अभिभावक बेहाल
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Apr 2019 1:59 AM
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प्रमोद तिवारी, गोपालगंज : पिछले कुछ सालों से शिक्षा के मायने बदल गये हैं. अपने लाडलों को अंग्रेजी मीडियम से पढ़ाने के प्रति अभिभावकों का रुझान प्राइवेट स्कूलों की ओर है. लेकिन, इस शौक ने अभिभावक को परेशान कर रखा है. नामांकन कराने को लेकर इन प्राइवेट स्कूलों की चौखट पर जहां कानून की धज्जियां […]
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प्रमोद तिवारी, गोपालगंज : पिछले कुछ सालों से शिक्षा के मायने बदल गये हैं. अपने लाडलों को अंग्रेजी मीडियम से पढ़ाने के प्रति अभिभावकों का रुझान प्राइवेट स्कूलों की ओर है. लेकिन, इस शौक ने अभिभावक को परेशान कर रखा है.
नामांकन कराने को लेकर इन प्राइवेट स्कूलों की चौखट पर जहां कानून की धज्जियां उड़ रही हैं, वहीं री-एडमिशन और अन्य शुल्क से अभिभावक परेशान हैं.
स्कूलों में नामांकन का समय है. अभिभावकों के सामने अच्छा और बेहतर स्कूल चुनने की कठिन परीक्षा है. एक ओर अभिभावक अपनी जेब देख रहे हैं, तो दूसरी ओर बच्चों का भविष्य.
अमूमन शहर के स्कूलों में नामांकन शुल्क के रूप में तीन हजार से 15 हजार रुपये लिये जा रहे हैं. दूसरी ओर, री-एडमिशन शुल्क और जान मार रहा है. इसके लिए नियम तो बने हैं, लेकिन पालन कौन करायेगा? निजी स्कूलों की मॉनीटरिंग की जवाबदेही समग्र शिक्षा अभियान के हवाले है. विभाग की तरफ से कभी जांच-पड़ताल, कार्रवाई नहीं होती. जिसका फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं. अभिभावकों की जेब पर सीधे डाका डाल रहे हैं.
क्या कहता है कानून
वर्ष 2018 में सरकार ने सीबीएसइ संचालित स्कूल नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट, नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी और सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाये गये दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया था. प्राइवेट स्कूलों को फीस में भी पूरी पारदर्शिता लानी होगी.
इसके तहत स्कूल वेबसाइट और फॉर्म पर जो फीस बतायी गयी है, उतनी ही फीस अभिभावकों को देनी होगी. स्कूल किसी भी तरीके का हिडेन चार्ज यानी छुपा हुआ चार्ज अभिभावकों से नहीं वसूलेगा.
स्कूल नहीं, मेहनत पर निर्भर है सफलता
प्राइवेट स्कूल से पढ़कर डॉक्टर बने अवधेश तिवारी बताते हैं कि शिक्षा व्यक्ति के अंदर निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है. मनुष्य बोरा नहीं है कि उस में भर दिया जाये. शिक्षक का काम किसान के जैसा है. किसान जैसा खेत तैयार करता है.
उसी तरह से शिक्षक का काम है छात्रों में जिज्ञासा पैदा करना, ताकि ज्ञान के प्रति ललक बढ़े. मैं भी सरकारी स्कूल का ही छात्र रहा. उस समय के शिक्षक और छात्रों में प्रेम था. तब हमें अभ्यास करना होता था, प्रश्नों के उतर स्वयं से खोजने होते थे, शिक्षक केवल सूत्र बताते थे, जबकि आज सूत्र के बदले उत्तर बता दिया जाता है.
इससे छात्रों को स्वाध्याय का मौका नहीं मिल रहा. आज एक शिक्षक एक विषय पढ़ाता है, जबकि पहले एक शिक्षक सारे विषय पढ़ाते थे. जरूरत है थोड़ी बदलाव की, कोई जरूरी नहीं कि प्राइवेट स्कूल में पढ़ कर ही कुछ बने, सरकारी स्कूल में भी अगर व्यवस्था में थोड़ी बदलाव कर दी जाये, तो पहले वाला माहौल कायम हो जायेगा.
ड्रेस से लेकर किताब तक स्कूल से खरीदने की मजबूरी
राज्य में बीएसइबी या सीबीएसइ बोर्ड की पढ़ाई होती है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में एनसीइआरटी के किताबों के बजाय हर प्राइवेट स्कूल अलग-अलग प्रकाशन के किताब पढ़ातें हैं जो काफी महंगी है. किताब से लेकर यूनिफॉर्म तक स्कूल से खरीदने की बाध्यता है. जिसमें स्कूल संचालक मोटी कमाई कर रहे हैं.
स्कूल के शुल्क
नामांकन शुल्क : 3000-25000
पुनः नामांकन : 3000-12000
मंथली शुल्क : 400-1800
किताबों का मूल्य : 1200-6500
वाहन चार्ज : 300-1500
यूनिफॉर्म : 1500-3000
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