ePaper

रोजगार की तलाश में गये आठ मजदूरों की 20 दिनों में मौत, अब उठी कल-कारखाने खोलने की मांग

Updated at : 10 Feb 2026 10:52 PM (IST)
विज्ञापन
रोजगार की तलाश में गये आठ मजदूरों की 20 दिनों में मौत, अब उठी कल-कारखाने खोलने की मांग

इमामगंज विधानसभा क्षेत्र में पिछले 20 दिनों के भीतर रोजगार के लिए परदेश गये 8 अप्रशिक्षित मजदूरों की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है.

विज्ञापन

निर्भय कुमार पांडेय, इमामगंज. इमामगंज विधानसभा क्षेत्र में पिछले 20 दिनों के भीतर रोजगार के लिए परदेश गये 8 अप्रशिक्षित मजदूरों की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है. दो अलग-अलग राज्यों (छत्तीसगढ़ और कर्नाटक) की फैक्ट्रियों में हुए हादसों के बाद क्षेत्र में मातम पसरा है. इन घटनाओं ने एक बार फिर इलाके में कल-कारखाने और स्थानीय रोजगार की मांग को हवा दे दी है. मौतों का यह तांडव 22 जनवरी को शुरू हुआ, जब छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार (भाटापारा) स्थित इस्पात संयंत्र में हुए भीषण विस्फोट में डुमरिया के गोटी बांध निवासी 6 मजदूरों, श्रवण कुमार, राजदेव कुमार, जितेंद्र भुइंया, बद्री भुइंया, विनय भुइंया और सुंदर भुइंया की दर्दनाक मौत हो गयी थी. इसी हादसे में घायल देवरी गांव के रामू भुइंया ने भी 30 जनवरी को दम तोड़ दिया. जख्म अभी भरा भी नहीं था कि नौ फरवरी को इमामगंज प्रखंड के सुदूरवर्ती नावाखाप गांव के अखिलेश भारती की कर्नाटक के एक स्टील प्लांट में काम करने के दौरान मौत हो गयी.

नक्सलवाद गया, पर विकास अब भी कोसों दूर

इमामगंज वह इलाका है, जहां 1980 के दशक में नक्सलवाद ने पैर पसारे थे. 1981 में एक जमींदार की हत्या के बाद यहां दहशत का माहौल बन गया था. हालांकि, केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों से अब नक्सल समस्या अंतिम सांसें गिन रही है, लेकिन विकास की रफ्तार अब भी थमी हुई है. बुद्धिजीवियों का कहना है कि नक्सल डर से पहले यहां उद्योग नहीं लगते थे, लेकिन अब शांति होने के बावजूद नेताओं की उदासीनता बाधक बनी हुई है. चुनाव में वादे तो होते हैं, पर धरातल पर कोई फैक्ट्री नहीं लगती. क्षेत्र के बुद्धिजीवी मानते हैं कि इस इलाके में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और लघु उद्योग आसानी से स्थापित किये जा सकते है. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा होगा और पलायन रुकेगा.

गांवों में बचे हैं सिर्फ बुजुर्ग और महिलाएं

समाजसेवी संतोष कुमार शौण्डिक बताते हैं कि रोजगार न होने से युवाओं का पलायन गंभीर सामाजिक समस्या बन गया है. काम की तलाश में युवा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक जा रहे हैं. गांवों में अब सिर्फ महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे बचे हैं. इससे खेती-किसानी प्रभावित हो रही है और सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है.

अप्रशिक्षित होना बन रहा काल

स्थानीय लोगों के अनुसार, बाहर जाने वाले अधिकांश मजदूर अप्रशिक्षित होते हैं. उन्हें खतरनाक मशीनों पर काम करने के लिए लगा दिया जाता है, जिससे वे आसानी से हादसों का शिकार हो जाते हैं. संतोष कुमार शौण्डिक ने मांग की है कि मजदूरों को बाहर भेजने से पहले विशेष प्रशिक्षण दिया जाये और उनका सुरक्षा बीमा अनिवार्य हो.

पुराने जख्म अब भी हरे

इलाके के लोग 24 मई, 2025 की उस मनहूस तारीख को भी नहीं भूले हैं, जब यमुना एक्सप्रेस-वे पर हुए सड़क हादसे में झिकटीया पंचायत के चपरी गांव के रंजीत कुमार मांझी और तीन मासूम बच्चों की मौत हो गयी थी. वे भी मजदूरी के लिए दिल्ली गये थे. स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सरकार ने क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां या लघु उद्योग लगाए होते, तो आज ये नौजवान जिंदा होते.

विज्ञापन
PRANJAL PANDEY

लेखक के बारे में

By PRANJAL PANDEY

PRANJAL PANDEY is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन