खाड़ी देशों की मोहताज नहीं बतसपुर की रसोई...गोबर से बनी गैस दे रही आत्मनिर्भरता की मिसाल

Updated at : 10 Mar 2026 10:55 PM (IST)
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खाड़ी देशों की मोहताज नहीं बतसपुर की रसोई...गोबर से बनी गैस दे रही आत्मनिर्भरता की मिसाल

मिडिल ईस्ट में भड़के ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत के ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है. देश में एलपीजी सिलिंडर के दाम बढ़ गये हैं.

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बोधगया. मिडिल ईस्ट में भड़के ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत के ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है. देश में एलपीजी सिलिंडर के दाम बढ़ गये हैं, सप्लाइ का संकट खड़ा हो गया है और पैनिक बुकिंग के कारण सरकार को रिफिल का समय बढ़ाना पड़ा है. लेकिन गया जिले के बोधगया ब्लॉक स्थित बतसपुर गांव के लोगों को खाड़ी देशों के इस तनाव से कोई खौफ नहीं है. कारण बिल्कुल साफ है, यह गांव अपनी रसोई गैस खुद बनाता है. भारत अपनी जरूरत की अधिकांश एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है, जो सीधे तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है. जब वहां सप्लाइ बाधित होती है, तो यहां आम आदमी की जेब कटती है. इस विदेशी निर्भरता का तार्किक और स्थायी समाधान बतसपुर में देखा जा सकता है. यहां ””स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण)”” के तहत 50 लाख रुपये की लागत से एक सामुदायिक बायोगैस प्लांट स्थापित किया गया है. यह प्लांट हर दिन दो टन गोबर की खपत करता है और एलपीजी के मुकाबले आधी कीमत पर गांव के 35 घरों में पाइपलाइन के जरिये गैस की निर्बाध आपूर्ति कर रहा है. जब शहरों में लोग गैस के लिए हफ्तों का इंतजार कर रहे हैं, बतसपुर की महिलाओं की रसोई बिना किसी विदेशी खौफ के सुचारू रूप से चल रही है.

कचरे का अर्थशास्त्र : 50 पैसे किलो बिक रहा गोबर

इस प्रोजेक्ट ने गांव का पूरा अर्थशास्त्र बदल दिया है. प्लांट को चलाने के लिए पशुपालकों से 50 पैसे प्रति किलो की दर से गोबर खरीदा जाता है. इससे न सिर्फ सड़कों और गलियों से पशु अपशिष्ट (कचरे) का स्थायी समाधान हुआ है, बल्कि ग्रामीणों को कचरे से अतिरिक्त कमाई भी हो रही है. इसके साथ ही, गैस बनने के बाद निकलने वाले अपशिष्ट (बायो-कम्पोस्ट) को उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में बेहद कम कीमत पर किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है.

धुएं से आजादी और स्वास्थ्य में सुधार

इस आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा फायदा गांव की महिलाओं को हुआ है. शोभा देवी और निर्मला देवी जैसी दर्जनों महिलाओं को अब एलपीजी के महंगे होने का डर नहीं सताता. इसके साथ ही उन्हें घंटों तक उपले (गोइठा) पाथने और चूल्हे के जानलेवा धुएं से हमेशा के लिए छुटकारा मिल चुका है.

पूरे राज्य में लागू करने की जरूरत

बतसपुर का यह बायोगैस प्लांट साबित करता है कि अगर विकेंद्रीकृत तरीके से ऊर्जा का उत्पादन किया जाए, तो भारत किसी भी वैश्विक गैस त्रासदी का सामना कर सकता है. ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने स्पष्ट किया है कि बोधगया के बतसपुर और पूर्वी चंपारण में यह बायोगैस पायलट प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल रहा है. उन्होंने कहा कि लोहिया स्वच्छ मिशन के तहत ऐसे संयत्रों को बढ़ावा देने के लिए विभाग के पास पर्याप्त धनराशि है. अब जरूरत इस बात की है कि फाइलों से निकलकर इस मॉडल को युद्ध स्तर पर हर जिले में लागू किया जाये.

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