एमयू के अर्थशास्त्र विभाग ने आयोजित किया सेमिनार, गांवों तक पहुंचाना होगा ''मेक इन इंडिया'' को

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बोधगया: मगध विश्वविद्यालय में बुधवार को ‘मेक इन इंडिया : रोड अहेड’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया. इसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र के ज्ञाता शिक्षकों ने अपने-अपने विचारों को रखा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किये गये ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम की सराहना की. वक्ताओं ने आंकड़ों व हकीकत से अवगत कराते […]

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बोधगया: मगध विश्वविद्यालय में बुधवार को ‘मेक इन इंडिया : रोड अहेड’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया. इसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र के ज्ञाता शिक्षकों ने अपने-अपने विचारों को रखा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किये गये ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम की सराहना की. वक्ताओं ने आंकड़ों व हकीकत से अवगत कराते हुए कहा कि उत्पादन बढ़ाने व रोजगार सृजन करने में ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम सहायक साबित हो सकता है. लेकिन, इसके लिए गांवों को जोड़ना होगा व देशी-विदेशी निवेश के लिए उचित माहौल भी तैयार करना होगा.
कल-कारखानों पर भी जोर
रांची यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के पूर्व हेड प्रो एमएल सिंह ने कहा कि कोई भी देश तब तक विकासशील नहीं हो सकता जब तक वहां कल-कारखानों का विकास न हो पाये. उन्होंने उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कारखानों के विकास पर भी जोर दिया. सेमिनार में स्वागत भाषण करते हुए एमयू के अर्थशास्त्र विभाग के हेड प्रो एलएस सिंह ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ का नारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर 2014 को दिया था. इसका मतलब भारत को दुनिया के नक्शे में उत्पादन का मैनुफैक्चरिंग हब बनाना है. विदेशी निवेश को बढ़ाना है व कृषि से उत्पादन की तरफ रोजगार केंद्रित करना है. उन्होंने कहा कि इसी आधार पर बहुत सारी योजनाओं को शुरू किया गया है.
इसमें डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया व अन्य शामिल हैं. इस दौरान प्रो सिंह ने आगत अतिथियों को बुके व शॉल भेंट कर सम्मानित किया. सेमिनार का उद्घाटन दीप प्रज्वलित कर किया गया. एमयू के अर्थशास्त्र विभाग व एसोसिएशन ऑफ सोशियो इकोनॉमिक्स डेवलपमेंट स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सेमिनार में डॉ राजेश कुमार, सीमा सिंह, दरकशां अहमद, शीप्रा सिंह, गुडली सिन्हा, कृतिका किरणम्, रितिका, शमीमउल हक, जेबा अशरफ ने सराहनीय योगदान दिया. सेमिनार का समापन गुरुवार को होगा. सेमिनार को आयोजन शिक्षा विभाग के डॉ राधाकृष्णन हॉल में किया जा रहा है.
शिक्षा, योग्यता व व्यवहार पर निर्भर है ‘मेक इन इंडिया’
दो दिवसीय सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए कोल्हान यूनिवर्सिटी(झारखंड) के कुलपति प्रो रामप्रवेश प्रसाद सिंह ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ वास्तव में हमारे शिक्षा, योग्यता व व्यवहार पर निर्भर करता है. उन्होंने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ का मतलब सिर्फ किसी सामान का उत्पादन करना नहीं है, बल्कि अपने अंदर एक प्रोडक्टिव और पॉजिटिव सोंच लाने की प्रक्रिया है. इसके अंतर्गत मां-बाप के बाद एक शिक्षक का विशेष यागदान होता है. उन्होंने स्टूडेंट्स से कहा कि देशभक्ति की भावना से काम करने की जरूरत है, तभी देश का विकास व कल्याण संभव है.

सेमिनार में डॉ विनोद कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ पॉलिसी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार पर देखना जरूरी है, क्योंकि देश की 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है. उन्होंने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत जो भी निवेश हुआ है, वह बड़े शहरों व राज्यों में (बंगलुरु, गुजरात आदि ) हुआ है. उन्होंने कहा कि अब तक कुल निवेश का एक प्रतिशत भी छोटे शहरों में नहीं हो पाया है व अगर लंबे अवधि तक मौजूदा सात-आठ प्रतिशत की विकास दर पर बने रहना है तो हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को साथ में लेकर चलना होगा. इससे हमें उत्पादन के साथ ही रोजगार के अवसर भी हासिल होंगे.

योग्यता के आधार पर मिले रोजगार
सेमिनार में मुख्य अतिथि दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली विवि के पूर्व डीन सह दिल्ली स्कूल ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज ऑफ रिसर्च के अध्यक्ष प्रो बीपी सिंह ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ अपने लक्ष्य में कामयाब सिर्फ प्रोग्राम व पॉलिसी के आधार पर नहीं हो सकता है. इसके लिए सोंच और कार्यशैली में भी सुधार की जरूरत है. उन्होंने स्टेट के विश्वविद्यालयों में नामांकन, परीक्षा व डिग्री बांटने के प्रचलन होने का जिक्र करते हुए कहा कि लोगों को सिर्फ डिग्री के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी योग्यता के आधार पर रोजगार मुहैया कराना होगा. वहीं, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला अंतर्गत स्कूल ऑफ सोशल साइंस में अर्थशास्त्र के हेड प्रो डीके मदन ने कहा कि सरकार ने 25 क्षेत्रों में एफडीआइ के लिए शत-प्रतिशत निवेश करने का प्रावधान किया है. इसमें 2015 तक 33.9 बिलियन डाॅलर का निवेश हो चुका है. फिलहाल, 120 देश भारत के साथ व्यवसाय करने को आगे आये हैं.

लेकिन, ‘मेक इन इंडिया’ के तहत उत्पादन में भागीदारी जो कि अभी सकल घरेलू उत्पाद का 16 प्रतिशत है, इसे बढ़ा कर 2025 तक 25 प्रतिशत करना होगा. डॉ बीआर आंबेडकर यूनिवर्सिटी, लखनऊ के पूर्व कार्यकारी वीसी प्रो एनएमपी वर्मा ने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ का मतलब रोजगार मुहैया कराना है. इसके लिए केवल कृषि अर्थव्यवस्था के सहारे हम बेरोजगारी से नहीं लड़ सकते. हमें इसके लिए मैनुफैक्चरिंग में रोजगार बढ़ाना होगा. हमें अच्छा व्यावसायिक वातावरण बनाना होगा, ताकि विदेशी निवेश को आकर्षित कर सके.

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