''शराब समाज को नष्ट करे, इससे पहले शराब को नष्ट कर दो''

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date

गया : जय प्रकाश नारायण ने केवल व्यवस्था परिवर्तन के लिए ही अांदोलन नहीं किया, बल्कि उन्होंने समाज में दबे-कुचले लोगों को हक दिलाने के लिए भी संघर्ष किया. उनकी सोच थी कि समाज तभी सशक्त रहेगा जब वह स्वस्थ रहेगा.

यही कारण था कि 1974 में जब देश में इमरजेंसी के खिलाफ वह आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, तो उन्होंने आंदोलनकारियों से शराब की भट्ठियों को भी रोकने को कहा. गया में जेपी के साथ आंदोलन में रहे बुजुर्गों ने उस दौर के संघर्ष को साझा करते हुए इस मुद्दे पर कई बातें कहीं. इन जेपी सेनानियों ने बताया कि जय प्रकाश कहते थे कि शराब इस समाज को नष्ट कर दे, इससे पहले शराब को ही नष्ट कर दो.
जय प्रकाश नारायण की जयंती के मौके पर प्रभात खबर द्वारा जेपी सेनानी अशोक प्रियदर्शी, उपेंद्र सिंह,भरत प्रसाद, प्रभात कुमार सिन्हा व सुरेश प्रसाद ने बताया कि 1974 में आंदोलन के दौरान जेपी के आह्वान पर उन लोगों ने गया में हर उस जगह पर धरना दिया, जहां शराब बनायी और बेची जाती थी. मानपुर में जहां शराब का स्टोरेज था वहां भी आंदोलनकारियों ने धरना दिया.
इन क्रांतिकारियों ने कहा कि जेपी कहते थे शराब के निर्माण और बिक्री पर रोक से उस वक्त सरकार के राजस्व को भी रोका जा सकता था और समाज के लोगों को इस व्यसन से दूर कर उन्हें राष्ट्र निर्माण के आंदोलन में जोड़ा जा सकता है.
कर्फ्यू तोड़ गांधी मैदान में उमड़ा था जन सैलाब आंदोलनकारियों ने बताया कि 12 अप्रैल 1974 में गया में गोलीकांड के बाद सरकार ने कर्फ्यू लगा दिया. गया में आंदोलन के नेतृत्व करने वालों में से एक अखौरी निरंजन पटना गये. वहां उनसे जय प्रकाश नारायण ने कहा कि गया में सभा कराओ. अखौरी गया लौट कर आये लोगों से मिल कर जेपी के आने की सूचना दी. दो दिनों के बाद जय प्रकाश नारायण गया पहुंचेे.
गांधी मैदान में उनकी सभा प्रस्तावित थी. यह जेपी के प्रति विश्वास और उनकी नेतृत्व क्षमता थी कि उस दिन कर्फ्यू की चिंता किये बगैर लाखों लोग सड़क पर उतर गये और जेपी को सुनने गांधी मैदान पहुंच गये. यहां से जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया और आंदोलन तेज हो गया. जेपी ने गया में गरीबों को जमीन दिलाने के लिए भी संघर्ष किया. यह उनकी देन है कि गया में हजारों-लाखों लोगों को उनकी जमीन वापस मिली.
इन जेपी सेनानियों ने कहा कि 40 वर्ष की उम्र में और 72 वर्ष की उम्र में भी देश के युवाओं का नेतृत्वकर्ता बनने का सौभाग्य केवल जेपी को ही प्राप्त था. यह उनका तेज था कि जब-जब उन्होंने हुंकार भरी, युवा उनके साथ खड़ा हो गये. लेकिन जेपी सेनानी इस बात पर भी अफसोस करते हैं कि जिस मूल के लिए जेपी ने संघर्ष किया उसे यह देश बचा नहीं पाया. समाज में आये नैतिक पतन इसका मुख्य कारण है.
जेपी की जयंती पर प्रभात खबर कार्यालय में संगोष्ठी
इमरजेंसी आंदोलन के दौरान शायद ही कोई युवा होगा जो जेपी से प्रभावित नहीं था. हर कोई केवल जेपी के निर्देशों के इंतजार में रहता था. किसी को खुद की परवाह नहीं होती थी. सभी जेपी के उद्देश्यों के साथ खड़े थे. हर कोई इस देश में व्यवस्था परिवर्तन चाहता था.
सुरेश प्रसाद
जेपी ने शराबबंदी करने को कहा था. हम सभी आंदोलन के साथ-साथ गया में शराब की बिक्री न हो इसके लिए भी काम करते थे. शराब की भट्ठियों को बंद कराया. कई लोगों ने जेपी के प्रभाव में स्वयं नशा करना छोड़ दिया. जेपी समाज के महानायक के तौर पर आये थे.
भरत प्रसाद
जय प्रकाश नारायण 40 वर्ष की उम्र में भी युवाओं के नेता थे और 72 वर्ष में भी. इसका एकमात्र कारण था उनका जमीनी मुद्दे पर टीके रहना. चाहे भूदान आंदोलन हो या इमरजेंसी के खिलाफ आंदोलन उन्होंने उन मुद्दों पर संघर्ष किया, जिससे समाज का सरोकार था.
अशोक प्रियदर्शी
जेपी ने समाज के उन लोगों को खड़ा कर दिया, जो दबे-कुचले थे. जो व्यवस्था की तानाशाही बर्दाश्त कर जी रहे थे. जेपी उन सभी की आवाज बन कर खड़े थे. यही कारण हुआ कि जब-जब जेपी ने व्यवस्था के खिलाफ बिगुल फूंका देश के हर गरीब उनके साथ खड़ा हो गया.
उपेंद्र सिंह
Share Via :
Published Date
Comments (0)
metype

संबंधित खबरें

अन्य खबरें