गया/पटना : प्रभात खबर अखबार का सामाजिक सरोकारों से जुड़ा ‘बचपन बचाओ अभियान’ तेजी और सफलतापूर्वक गति पकड़ रहा है. प्रभात खबर के लिए यह अभियान सामाजिक सहभागिता और प्रतिबद्धता से जुड़ा है. प्रदेश की नयी पीढ़ी को सुरक्षित सामाजिक परिवेश निर्मित करने के मकसद से शुरू इस अभियान में बच्चों की ललक और उनका उत्साह चरम पर देखने को मिला. अभियान एक कारवां में तब्दील होता दिखा रहा है. बचपन बचाओ अभियान कार्यक्रम में बच्चों और समाज के गणमान्य लोगों की उपस्थिति उत्साहवर्धक रही है.
शुरुआती दो दिनों में ही इस कार्यक्रम में पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर व गया में 2500 से अिधक बच्चे भाग ले चुके हैं. यह अभियान प्रदेश भर में एक महीने तक जारी रहेगा और हजारों बच्चे इसका िहस्सा बनेंगे.
पटना में प्रभात खबर की ओर से बचपन बचाओ अभियान कार्यक्रम की शुरुआत बीते गुरुवार को लोयला हाईस्कूल अौर दूसरे दिन कृष्णा निकेतन स्कूल में की गयी. कार्यक्रम के दौरान पांच सौ से अधिक बच्चों ने भागीदारी की. मनोवैज्ञानिक डॉ बिंदा सिंह और बिहार के केबीसी विजेता सुशील कुमार और दूसरे दिन डॉ समिधा पांडेय
बचपन बचाओ अभियान…और पूर्व डीजीपी डीएन गौतम ने बच्चों के सवालों के प्रभावी जवाब दिये. सोशल साइटों पर घंटों समय बिताने के बाद भी वह इतने स्ट्रेस में क्यों हैं? इन सारे सवालाें के जवाब बच्चों से जानने की कोशिश की गयी. इस दौरान ज्यादातर बच्चे स्कूल के पढ़ाई और मिलने वाले होमवर्क के कारण तनावग्रस्त रहने की बात कही. कुछ बच्चों ने अभिभावक द्वारा डॉक्टर और इंजीनियर बनने जैसी अपेक्षाओं के तले दबे रहने की बात कही. स्कूली लड़कियों ने
अभिभावकों की उनकी सेफ्टी से जुड़ी चिंताएं भी जाहिर कीं.
गया में 26 अप्रैल को इंडियन सेंट्रल स्कूल और दूसरे दिन 27 अप्रैल को सिटी पब्लिक स्कूल में बचपन बचाओ अभियान कार्यक्रम का आयोजन हुआ. पहले दिन करीब तीन सौ और दूसरे दिन चार सौ बच्चों ने भाग लिया. इन कार्यक्रमों में डॉ धनंजय धीरज, डॉ पंकज कुमार, विनोद कुमार, डॉ माधवेंद्र कुइला व डॉ एसके में विषय विशेषज्ञ मौजूद रहे. बच्चों ने प्रमुख रूप से घर और स्कूल-कॉलेजों में रहने-सहने और पढ़ने-लिखने में स्वतंत्रता से संबंधित सवाल उठाये.
मुजफ्फरपुर में बचपन बचाओ अभियान की शुरुआत गुरुवार को डीएवी पब्लिक स्कूल, बखरी से हुई. अतिथि के तौर पर डीआईजी अनिल कुमार सिंह और मोटिवेटर मनोज कुमार वर्मा ने बच्चों से संवाद किया. अनिल कुमार सिंह ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को लेकर भी बच्चों की सीख दी और कहा कि सप्ताह में एक दिन बच्चे डिजिटल उपवास करें.
26 अप्रैल को भागलपुर के एसकेपी विद्या विहार (सीबीएसई से मान्यताप्राप्त) में बचपन बचाओ अभियान की शुरुआत हुई. इसमें 700 से अधिक बच्चों ने भाग लिया. 27 अप्रैल को आनंदराम ढांढनियां सरस्वती विद्या मंदिर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसमें महादेव सिंह कॉलेज के प्राचार्य डॉ केडी प्रभात
की मौजूदगी में 1000 से अधिक बच्चों ने भागीदारी की. बच्चों ने सवाल किया कि वे जो चाहते हैं वह
इसलिए नहीं पढ़ पाते कि अभिभावक नहीं चाहते.
अब तक पटना, गया भागलपुर व मुजफ्फरपुर में 2500 से अिधक
बच्चों ने अपनी समस्याएं साझा कीं
बच्चों को नयी सदी का नेता बनाएं चंद परीक्षाओं के बंदी नहीं हों बच्चे
(शरद सागर डेक्सटेरिटी ग्लोबल के सीईओ हैं. शिक्षा और नेतृत्व के क्षेत्र में एक नयी पीढ़ी को तैयार करने में इनकी भूमिका को विश्व स्तर पर सराहा गया है. वे फोर्ब्स 30 अंडर 30 में जगह पाने वाले पहले बिहारी हैं.)
शरद सागर
आज जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो खुद की ही यात्रा अद्भुत-सी लगती है. सीवान के जीरादेई में पैदा होना, मीरगंज, छपरा, पटना में पलना-बढ़ना, 12वीं के बाद करोड़ों की छात्रवृत्ति पर अमेरिका पढ़ने जाना, विश्वविद्यालय के 160 साल के इतिहास में पहला भारतीय स्नातक वक्ता होना और फिर मास्टर्स की डिग्री के लिए हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ऑफर को ठुकरा कर बिहार लौट आना. लोग अक्सर पूछते हैं, ऐसा कैसे हुआ? और मैं हमेशा एक ही जवाब देता हूं
बच्चों को नयी…
मुझे बचपन से ही परीक्षाओं का शौक रहा है, मगर समय के साथ उनकी परिभाषा भी बदली है. जब हम छोटे होते हैं, परीक्षाएं बातों को, व्यक्तियों को, वस्तुओं को याद रखने की होती हैं. धीरे-धीरे यही परीक्षाएं याद रखने से बढ़ कर समझने के बारे में होने लगती हैं. अब हम किसी के कथन को हू-ब-हू लिखने की जगह उस पर टिप्पणी करते हैं. किसी व्यक्ति के नाम और पद को याद करने की जगह उनके कार्यकाल, उनके आविष्कारों के बारे में लिखने लगते हैं और वही गाड़ी, वही सूर्य, वही घड़ी, जिनका नाम जानना ही अब तक काफी था, हम उनके पीछे के विज्ञान को जानने लगते हैं. और समय के साथ हमारी शिक्षा की असल परीक्षा-याद रखने से समझने की दूरी को तय करते-बंद कमरों के बाहर, असल दुनिया में होने लगती है.
असल जीवन की परीक्षाएं क्या हैं? संघर्ष की भाषा समझना, सफलता का व्याकरण. परेशानियों से जूझना, नये विचारों को सामने लाना. आविष्कारों से, वार्ताओं से, नीतियों से, अपने कार्यों से राष्ट्र निर्माण में भूमिका निभाना. खुद थोड़ा मधुर होना, अनुशासित होना, कर्मठ होना. परिवार का एक अंग होना, देश के काम आना. भारत चांद पर जीवन खोजता है
बच्चों को नयी…
हमें वैज्ञानिक चाहिए. करोड़ों आज भी बेघर हैं, अच्छी नीतियों की आवश्यकता है. विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तैयार हो रही है, अच्छे अर्थशास्त्री, गणितज्ञ, लेखपाल, उद्यमी चाहिए. भारत के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों अपार हैं.
लेकिन हम और आप मिलकर परीक्षाओं के द्वारा योद्धाओं को तैयार करने की जगह, परीक्षाओं के लिए योद्धा तैयार करने लग गये, तो हम कहां जायेंगे? 13-14 साल के बच्चे डिप्रेशन में जा रहे हैं, 16-17 साल के युवाओं को 10वीं के बाद क्या, 12वीं के बाद क्या के यक्ष प्रश्न पूछे जा रहे हैं. मीडिया, मां-बाप, हम और आप मिलकर एक ऐसा समाज बना रहे हैं, जहां न शिक्षा की परिभाषा बदल रही है, न परीक्षा की. बदल रही है तो बस हमारी चुनौतियों की दुनिया. याद करने में प्रखर हमारे बच्चों से तेज कल कोई मशीन आ जायेगी,
तब 100 में 100 की क्या महत्ता रह जायेगी? आइए इस नयी सदी को समझें, इस नयी पीढ़ी को भी. ध्यान दें एक स्वतंत्र सोच विकसित करने पर, शोध की क्षमता के साथ वक्तृत्व और नेतृत्व की क्षमता विकसित करने पर. और अपने बच्चों को आने वाली सदी का नेता बनाएं, चंद परीक्षाओं का बंदी नहीं. परीक्षाओं को पाठ्यक्रम के पूरक के रूप में देखें और बच्चों को राष्ट्र के प्रेरक के रूप में.