फरक्का जल समझौते पर बिहार की नई मांग, संजय झा बोले- 2050 तक की जरूरत देखकर हो फैसला
संजय झा
फरक्का गंगा जल समझौते की 30 साल की अवधि 2026 में समाप्त हो रही है. जेडीयू नेता संजय कुमार झा ने केंद्र सरकार से बिहार की 2050 तक की पानी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नई जल बंटवारे की व्यवस्था बनाने की मांग की है.
Farakka Ganga Water Sharing Agreement: जेडीयू नेता और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने कहा है कि 1996 के भारत-बांग्लादेश गंगा जल समझौते को पुराने तरीके से आगे न बढ़ाया जाए. बिहार की मौजूदा और आने वाले वर्षों की पानी की जरूरत को ध्यान में रखकर नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. संजय कुमार झा ने केंद्र से मांग की है कि फरक्का जल समझौते की अवधि खत्म होने के बाद बिहार के हितों को भी ध्यान में रखा जाए. तीन दशक पहले बिहार में पानी की जो स्थिति थी, वह आज नहीं है.
लगातार नीचे जा रहा जलस्तर
बिहार के कई हिस्सों में भूजल लगातार नीचे जा रहा है. खेती, पीने के पानी और दूसरी जरूरतों के लिए गंगा पर निर्भरता बढ़ रही है. ऐसे में आने वाले समय में बिहार को कितने पानी की जरूरत होगी, इसका नए सिरे से हिसाब लगाया जाना जरूरी है.
संजय झा ने राज्यसभा में कहा कि बिहार समेत गंगा पर निर्भर राज्यों की साल 2050 तक की पानी की जरूरत का वैज्ञानिक तरीके से आकलन होना चाहिए. बिहार सरकार के अनुमान के अनुसार राज्य को भविष्य में करीब 2000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ सकती है.
12 दिसंबर 2026 के बाद क्या बदलेगा?
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को समझौता हुआ था. इस समझौते की अवधि 30 साल रखी गई थी. यानी इसकी मौजूदा अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी हो जाएगी. समझौते में फरक्का बैराज के पास गंगा के पानी को भारत और बांग्लादेश के बीच बांटने की व्यवस्था तय की गई है.
हर साल 1 जनवरी से 31 मई तक कम पानी वाले समय में एक तय नियम के आधार पर पानी का बंटवारा होता है. इस व्यवस्था की निगरानी दोनों देशों की संयुक्त समिति करती है. समझौते में यह भी कहा गया है कि दोनों देश सहमत हों तो इसे आगे बढ़ाया जा सकता है. यही वजह है कि अब बिहार के लिए यह सवाल अहम हो गया है कि आगे की व्यवस्था तय करते समय राज्य की बढ़ती पानी की जरूरत को कितना महत्व दिया जाएगा.
बिहार को अलग से पानी देने वाला समझौता नहीं है फरक्का करार
फरक्का समझौते को लेकर एक जरूरी बात यह है कि यह सीधे बिहार को पानी देने या बिहार के लिए पानी की मात्रा तय करने वाला समझौता नहीं है. यह भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का बैराज पर गंगा के पानी के बंटवारे की व्यवस्था से जुड़ा है.
लेकिन गंगा के पानी का इस्तेमाल और उसका बहाव बिहार की पानी की जरूरत से सीधे जुड़ा हुआ है. इसी वजह से बिहार में यह मुद्दा सिर्फ भारत-बांग्लादेश संबंधों का मामला नहीं माना जा रहा. इसका असर राज्य में खेती, पीने के पानी, भूजल और लंबे समय की जल सुरक्षा पर भी पड़ता है.
बिहार में एक तरफ बाढ़, दूसरी तरफ पानी की कमी
बिहार की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि राज्य को एक साथ बाढ़ और पानी की कमी दोनों का सामना करना पड़ता है. उत्तर बिहार में हर साल गंगा और उसकी सहायक नदियों के कारण कई इलाकों में बाढ़ आती है. दूसरी तरफ दक्षिण बिहार के कई क्षेत्रों में गर्मी के दौरान भूजल नीचे चला जाता है और पीने तथा सिंचाई के लिए पानी की परेशानी बढ़ जाती है.
यानी बिहार के सामने सिर्फ ज्यादा पानी पाने की चुनौती नहीं है. बड़ी चुनौती यह भी है कि बाढ़ के समय मिलने वाले अतिरिक्त पानी को किस तरह बचाकर रखा जाए और जरूरत के समय उसका इस्तेमाल किया जा सके.
2000 क्यूसेक की मांग
संजय झा ने बिहार सरकार के आकलन के आधार पर करीब 2000 क्यूसेक अतिरिक्त पानी की जरूरत बताई है. 2026 में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक फरक्का समझौते की समीक्षा के लिए बनी एक अंदरूनी समिति ने कम पानी वाले मौसम में बिहार की पीने के पानी और उद्योगों की जरूरत के लिए 900 क्यूसेक पानी की सिफारिश की है.
दोनों आंकड़ों के बीच काफी अंतर है. इसलिए बिहार के लिए वास्तव में कितने पानी की जरूरत होगी, इसे लेकर नए अध्ययन की जरूरत साफ दिखाई देती है.
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लगातार बदल रही बिहार की जरूरतें
संजय झा की मांग का सबसे अहम हिस्सा साल 2050 तक बिहार की पानी की जरूरत का आकलन है. उनका कहना है कि केवल 1996 के आंकड़ों के आधार पर आने वाले समय की व्यवस्था तय करना सही नहीं होगा.
बिहार में आबादी, खेती, उद्योग, शहरों और पीने के पानी की जरूरत लगातार बदल रही है. ऐसे में बिहार के लिए अगले 20 से 25 साल में कितने पानी की जरूरत होगी, इसका पहले से आकलन करके उसी के आधार पर आगे की व्यवस्था तय करने की मांग की जा रही है.
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By परितोष शाही
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