80 वर्षों की हड्डी में जागा जोश पुराना था..., जानें जब बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए

Updated at : 23 Apr 2022 12:58 PM (IST)
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80 वर्षों की हड्डी में जागा जोश पुराना था..., जानें जब बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए

अंग्रेजों के नाक में दम करने वाले वीर कुंवर सिंह ने तीन बार अंग्रेजों की सेना को हराया. 23 अप्रैल, 1858 को जगदीशपुर के पास अंग्रेजों को बुरी तरह हराया और अपने महल में लौटे. 26 अप्रैल 1858 को बाबू कुंवर सिंह ने वीरगति पायी. लेकिन उनकी वीरता से जुड़ी कहानी आज भी याद की जाती है.

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ठाकुर शक्तिलोचन. पटना. 13 नवंबर 1777 को बाबू साहबजादा सिंह के घर एक बच्चे ने जन्म लिया जो आगे चलकर बाबू कुंवर सिंह के नाम से जाने गये. 27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों और भोजपुरी जवानों के साथ उन्होंने आरा शहर पर कब्जा कर लिया. अंग्रेजों के नाक में दम करने वाले वीर कुंवर सिंह ने 26 मार्च 1858 को आजमगढ़ पर कब्जा किया. उन्होंने तीन बार अंग्रेजों की सेना को हराया. 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर के पास अंग्रेजों को बुरी तरह हराया और अपने महल में लौटे. 26 अप्रैल 1858 को बाबू कुंवर सिंह ने वीरगति पायी. लेकिन उनकी वीरता से जुड़ी कहानी आज भी याद की जाती है.

बाबू कुंवर सिंह पर 20 लाख रुपये का था कर्ज

1856 तक आते-आते बाबू कुंवर सिंह पर 20 लाख रुपये कर्ज हो गये. हालांकि, उन्होंने अंग्रेज सरकार से ऋणमुक्ति का अनुरोध किया था पर अंग्रेजों द्वारा किसी प्रकार की रियायत नहीं दी गयी. जीवन की बिल्कुल सांध्य वेला थी. वे लगभग अस्सी बसंत देख चुके थे. इसी समय कुछ ऐसा संयोग हुआ कि दानापुर, बैरकपुर और रामगढ़ में अंग्रेज सेना में भर्ती भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया.

बाबू कुंवर सिंह से नेतृत्व संभाला

विद्रोह अचानक और असंगठित था. अत: इन सिपाहियों ने एक सर्वमान्य नेतृत्व की तलाश शुरू कर दी और वह तलाश दानापुर रेजिमंट के सिपाहियों ने सबसे पहले पूरी की. वे लोग 26 जुलाई, 1857 को जगदीशपुर आये और बाबू कुंवर सिंह से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया. उनके आग्रह पर 80 वर्ष की उम्र में बाबू कुंवर सिंह ने नेतृत्व संभाल लिया. कठिन स्थिति में कुंवर सिंह ने जगदीशपुर लौटने का मन बना लिया. उनके लौटने की खबर ने अंग्रेजों में डर पैदा कर दिया था.

गोली उनके बांह व जांघ में जाकर लगी

अंग्रेजों ने गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, बनारस, छपरा हर तरफ घेराबंदी कर दी लेकिन यह घेराबंदी तब धरी-की-धरी रह गयी, जब 21 अप्रैल, 1958 को कुंवर सिंह ने बलिया से 10 मील पूरब शिवपुर घाट से गंगा नदी को पार कर लिया. अंग्रेजों की दो गोली उनके बांह व जांघ में जाकर लग गयी. जिसके बाद कुंवर सिंह रूके नहीं बल्कि जख्मी बांह को तलवार से काट कर गंगा को समर्पित कर दिया और जगदीशपुर पहुंचे.

23 अप्रैल, 1958 को अंग्रेजी फौज की करारी हार हुई

कुंवर सिंह से टकराने ली ग्रांड के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज 22 अप्रैल की शाम आरा से रवाना हुई. जगदीशपुर से दो मील दूर दुलौर गांव में विद्रोही खेमे से उनका सामना हुआ. विद्रोहियों ने कदम पीछे हटा लिये. अंग्रेज उनका पीछा करते हुए जंगल में प्रवेश कर गये और उसी समय अंग्रेजी सेना पर कुंवर सिंह के सैनिक चारों तरफ से टूट पड़े. अंग्रेजों को तब पीछे हटना पड़ गया था और वो किसी तरह जान बचाकर भागे. कैप्टन ली ग्रांड को सीने में गोली लगी. उसकी मौत हो गयी. 23 अप्रैल, 1958 को अंग्रेजी फौज की करारी हार हुई. कुंवर सिंह अपने महल लौट आये. हालांकि, तीन दिन बाद ही उनका निधन हो गया.

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