Darbhanga News: दिनकर के काव्य में अध्यात्म, शृंगार और वीरता तीनों का स्वर

Published by : PRABHAT KUMAR Updated At : 23 Sep 2025 10:20 PM

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Darbhanga News:संगोष्ठी में चेयर के अध्यक्ष डॉ प्रभाकर पाठक ने कहा कि दिनकर जानिसार हैं. उनके काव्य में अध्यात्म, शृंगार और वीरता तीनों का स्वर मिलता है.

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Darbhanga News: दरभंगा. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ””””दिनकर”””” की जयंती पर लनामिवि के पीजी हिंदी विभाग एवं दिनकर चेयर की ओर से पीजी भौतिकी विभाग में आयोजित ‘राष्ट्रकवि दिनकर के साहित्य की प्रासंगिकता’ विषयक संगोष्ठी में चेयर के अध्यक्ष डॉ प्रभाकर पाठक ने कहा कि दिनकर जानिसार हैं. उनके काव्य में अध्यात्म, शृंगार और वीरता तीनों का स्वर मिलता है. दिनकर इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे बहु स्वरीय हैं. दिनकर मानते थे कि हिंदू और मुसलमान की एकता से ही भारतीय समाज उन्नति कर सकेगा. वे कहते थे कि हिंदुओं को आचरण की कट्टरता और मुसलमानों को धार्मिक कट्टरता त्यागना होगा, तभी हमारा समाज बदल पायेगा. इस गहरी अंतर्दृष्टि से दिनकर साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता को देखना होगा.

राष्ट्र के सरोकार एवं चुनौतियों को संबोधित करता है दिनकर का साहित्य- प्रो. राेहिताश्व

चंद्रशेखर आजाद शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मध्य प्रदेश के प्राचार्य प्रो. रोहिताश्व कुमार शर्मा ने कहा कि आज के दौर में संस्कृति के सही अर्थों को समझना और भी आवश्यक है. दिनकर ने संस्कृति के मूल निहितार्थों को नितांत भारतीय दृष्टि से अभिव्यक्त किया है. उनका साहित्य राष्ट्र के सरोकार, राष्ट्र की चुनौतियों को संबोधित करता है. इसी नाते वे आज भी प्रासंगिक है.

दिनकर मानते थे कि अन्याय के सामने तटस्थ बने रहना सबसे बड़ा अन्याय- प्रो. मंजू राय

मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. मंजू राय ने कहा कि अपने देश की कला, संस्कृति और साहित्य का सम्मान किस रूप में करना चाहिए, यह हमें दिनकर से सीखना चाहिए. दिनकर मानते थे कि अन्याय के सामने तटस्थ बने रहना सबसे बड़ा अन्याय है. आज जब तटस्थता ही युगधर्म बन चुका है, ऐसे समय में दिनकर से प्रेरणा लेते हुए सत्य के पक्ष में अडिग होकर खड़े रहने की जरूरत है.

दिनकर आज के सबसे प्रासंगिक कवि- प्रो. उमेश

इससे पहले विषय प्रवेश कराते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने कहा कि दिनकर के साहित्य की प्रासंगिकता वर्तमान समय में पहले से भी अधिक बढ़ चुकी है. पूरी दुनिया जब युद्ध के साए में जीने को विवश है, तो ऐसे में दिनकर विश्व शांति और विश्व बंधुत्व का मार्ग दिखाते हुए आज के सबसे प्रासंगिक कवि के रूप में सामने आते हैं.

दिनकर जनता के कवि- प्रो. विजय

प्रो. विजय कुमार ने कहा कि दिनकर जनता के कवि हैं. दिनकर की कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ कई मायनों में भारत का सांस्कृतिक इतिहास है. दिनकर हिन्दी भाषियों में ही नहीं, गैर हिन्दी भाषियों के बीच भी बेहद लोकप्रिय हैं. डॉ सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि यह ठीक है कि दिनकर का एक पांव सदा राजपथ की ओर रहा, लेकिन दूसरा पांव हमेशा जनपथ पर था. इसी कारण सामाजिक यथार्थ की गहरी पकड़ उनके यहां देखने को मिलती है. मौके पर भौतिकी विभागाध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद, राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव, डॉ मुकुल बिहारी वर्मा, अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. अमरीश कुमार झा, डॉ विनीता कुमारी, डॉ प्रिया कुमारी, डॉ मधु प्रभा, डॉ संजय कुमार, डॉ कुमारी सुषमा आदि ने भी विचार रखा. इस दौरान मलय नीरव, जय प्रकाश, कंचन रजक, अपर्णा, शिवानी, अंशु, बबीता, रोहित पटेल, बेबी कुमारी, समीर, सुभद्रा आदि मौजूद थे.

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