प्रकृति के सापेक्ष खुद को तैयार करने का पर्व

Published at :14 Jan 2016 5:01 AM (IST)
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प्रकृति के सापेक्ष खुद को तैयार करने का पर्व

सामाजिक दायित्वों का भी यह पर्व देता है संदेश दरभंगा : अन्य त्योहारों की तरह मकर संक्रांति पर्व में भी कई संदेश निहित हैं. इसका अलग ही सामाजिक व वैज्ञानिक महत्व है. इस पर्व का मानवीय पहलू भी है. इसे मनाने की तैयारी में पूरा समाज जुटा है. तिल, गुड़, चूरा व मुरही की खरीदारी […]

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सामाजिक दायित्वों का भी यह पर्व देता है संदेश

दरभंगा : अन्य त्योहारों की तरह मकर संक्रांति पर्व में भी कई संदेश निहित हैं. इसका अलग ही सामाजिक व वैज्ञानिक महत्व है. इस पर्व का मानवीय पहलू भी है. इसे मनाने की तैयारी में पूरा समाज जुटा है. तिल, गुड़, चूरा व मुरही की खरीदारी कर चुकी महिलायें इसका लाइ बनाने में व्यस्त हो गयी हैं.
लाइ व तिलकुट का बाजार सज गया है. यह त्योहार 15 जनवरी को मनाया जायेगा. इस पर्व के मनाने की परंपरा पर गौर करें तो इसके सभी पहलू खुद-ब- खुद सामने आ खड़ेे होते हैं. मकर संक्रांति पर्व में तिल, गुड़ के सेवन की प्रधानता है. वहीं चूरा व मुरही के लाइ को ग्रहण करने की भी परंपरा है. आमतौर पर लोग दिन में लाइ के अलावा चूरा-दही खाते हैं, रात में खिचड़ी पकायी जाती है.
इन सभी खाद्य सामग्रियों की तासीर गरम होती है. तिल, गुड़ के साथ ही खिचड़ी भी शरीर को गरमी प्रदान करती है. मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तारयण होने लगते है. दिन बड़ी व रातें छोटी होनी आरंभ हो जाती है. सर्दी कम होने लगती है. मौसम में गरमी बढ़नी शुरू हो जाती है. जाड़े में पूरा शरीर ठंड के अनुरूप होता है. मौसम गरम होने के कारण शरीर को प्रकृति के अनुरूप तैयार करने का संदेश इस त्योहार में इन वस्तुआें के खाने की परंपरा बनायी गयी. दरअसल यह पर्व इसीका संदेश देता है.
इस पर्व में तिल, गुड़, खिचड़ी आदि के साथ ही गरम कपड़ों के दान का भी विधान है. समाजशास्त्रियों का कहना है कि इसके पीछे का संदेश यही है कि समाज के सभी लोगों के प्रति हम संवेदनशील रहें. जरूरतमंदों की मदद करें. आनेवाले दिन में वे शारीरिक रूप से परेशानी में न पड़ें इसकी चिंता करें. यही वजह है कि मकर संक्रांति पर गरीबों को ही दान देने की परंपरा बनायी गयी.
इसी तरह विशेषकर मिथिला क्षेत्र में मानवीय संवेदना की दृष्टि से भी इस पर्व का खास महत्व है. यहां त्यौहार के दिन सुबह में घर के बड़े-बुजुर्ग अपने से छोटों को तिल-गुड़ का प्रसाद देते हुए पूछते हैं ‘ तिल खेत बहब ‘. इसका जवाब हां में दिया जाता है. इस परंपरा के माध्यम से बड़े-बुजुर्गों को उनकी सेवा का वचन दिया जाता है. साहित्य अकादमी में मैथिली की प्रतिनिधि प्रो वीणा ठाकुर कहती हैं कि इसी तरह की परंपरा व विधान की वजह से अपनी सामाज में सुदृढ़ व समर्पित भावना पर आधारित पारिवारिक व्यवस्था आज भी कायम है.
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