...आइ फेर भूकंप एलै!
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :26 Apr 2015 8:07 AM (IST)
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दरभंगा : शनिवार की दोपहर आये भूकंप ने लोगों को दहशत में डाल दिया. इतनी लंबी अवधि का भूकंप किसी ने नहीं देखा था. कई भूकंप के झटके ङोल चुके थे लेकिन इतनी देर तक पहले कभी धरती डोलती नहीं रही थी.पहली बार ऐसा देखने को मिला. यह चर्चा हर जुबान पर थी. दरभंगा में […]
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दरभंगा : शनिवार की दोपहर आये भूकंप ने लोगों को दहशत में डाल दिया. इतनी लंबी अवधि का भूकंप किसी ने नहीं देखा था. कई भूकंप के झटके ङोल चुके थे लेकिन इतनी देर तक पहले कभी धरती डोलती नहीं रही थी.पहली बार ऐसा देखने को मिला. यह चर्चा हर जुबान पर थी. दरभंगा में सबसे विनाशक भूकंप 1988 में आया था. उस समय के लोग आज युवा-प्रोढ़ हैं.
इनलोगों की जुबान से यही बात फूट रही थी. लेकिन जब विनाश की काली इतिहास रचनेवाली 1934 के भूकंप को देख चुके लोगों के मुंह से भी ऐसी बात सुना तो सन्न रह गये. सहसा किसी को ऐतवार नहीं हो रहा था कि विनाश का इतिहास रचनेवाला 1934 का भूकंप भी इतनी देर का नहीं रहा था. पर उस जमाने के लोग जब ऐसी बात कह रहे थे तो अविश्वास की कोई वजह भी नहीं बच रही थी. मनीगाछी प्रखंड के चनौर निवासी वेदानंद झा 92 वसंत का अनुभव कर चुके हैं. 1934 का भूकंप उन्हें अभी भी याद है.
चर्चा होते ही उनके चेहरे पर खौफ की लकीरें गहरी हो जाती हैं. अब उन्हें बहुत कुछ दिखता नहीं है. बातें भी ठीक से प्रवाह में नहीं कर पाते. शनिवार को जब घर से उन्हें यह कहकर बाहर सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए परिजन पहुंचे कि ‘चलू भूकंप आबि गेलै’ इसपर उनके मुंह से बस इतना निकला ‘आइ फेर भूकंप एलै’ यह कहते कहते वे पुरानी यादों में खोते चले गये. पूछने पर 1934 के उस मंजर का दृश्य अपने शब्दों में बांधकर रखना शुरू कर दिया.
कहा- हम छोटे थे. भूकंप आया था. झटका इतना तेज था कि पूरा इलाका बर्बाद हो गया, लेकिन इतनी देर तक धरती डोलती नहीं रही. तुमलोग बता रहे हो कि इसबार डेढ़ मिनट से अधिक भूकंप रहा. महीना दिन तक बाबूजी और मां रात-रात भर जगे रहते थे. कहीं हल्का सा शोर मचता था कि भूकंप के खौफ से सभी मैदान की ओर दौड़ पड़ते थे.
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