दीपों का पर्व आज, बाजार में खरीदारी को उमड़ी भीड़
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 19 Oct 2017 12:28 PM
मोतिहारी : लोक समृद्धि की उपासना का पर्व दीपोत्सव को लेकर खुशियां चहुंओर हिलोरे मार रही है. आम से लेकर खास तक सभी दीपावली की तैयारी को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. बाजार पूरी तरह रौनकता की चकाचौंध से गुलजार है. 19 अक्टूबर को होने वाले पर्व के मद्देनजर बुधवार को खरीदारी के लिए […]
मोतिहारी : लोक समृद्धि की उपासना का पर्व दीपोत्सव को लेकर खुशियां चहुंओर हिलोरे मार रही है. आम से लेकर खास तक सभी दीपावली की तैयारी को अंतिम रूप देने में जुटे हैं. बाजार पूरी तरह रौनकता की चकाचौंध से गुलजार है. 19 अक्टूबर को होने वाले पर्व के मद्देनजर बुधवार को खरीदारी के लिए बाजार में आस्थावान लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी.
सभी ने पूजा-सामाग्री सहित अन्य सामाग्रियों की जमकर खरीदारी की. खासकर, महिलाओं की मूर्तियां, पोस्टर, दिये, फल, पूजन-सामाग्री सहित घरों की साज-सज्जा की सामग्रियों की खरीदारी के लिए शहर के कचहरी चौक, बलुआ चौक, मीना बाजार, हेनरी बाजार आदि विभिन्न जगहों पर खासी भीड़ उमड़ी. इधर, हर कोई पर्व को खास बनाने के मद्देनजर घरों के रंग-रोगन सहित साफ-सफाई के कार्य में मसगुल नजर आया. बच्चे, बूढ़े, जवान सभी का उत्साह देखते ही बन रहा है.
कपड़े व मिष्ठान की दुकान पर जुटी भीड़ : पर्व को लेकर बाजार की रौनकता देखते ही बन रही है. बुधवार को कपड़े व मिष्ठान की दुकानों पर लोगों की खासी भीड़ उमड़ी. अपने परिजनों के साथ पहुंचे बच्चों ने जहां अपने पसंद के परिधानों की खरीदारी की, तो वहीं बड़े-बुजुर्गों का विभिन्न प्रकार के मिठाई सहित अन्य पकवानों की खरीदारी के लिए दुकानों पर तांता लगा रहा. सभी उत्साहित नजर आ रहे थे.
घरों की सफाई कर जलाएं दीपक
वेद विद्यालय के प्राचार्य सुशील कुमार पांडेय ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार, दीपावली पर मां लक्ष्मी एवं दरिद्रा दोनों बहनें साथ-साथ निकलती हैं. जहां प्रकाश एवं प्रसन्नता होती है. वहां लक्ष्मी निवास करने लगती है. वहीं जहां अंधकार और कलह होता है. वहां दरिद्रा निवास करने लगती है. इसलिए हमें सफाई कर दीपक से घरों को प्रकाशित करने की जरूरत है.
केरोसिन का तेल है निकृष्ट
दीपदान के लिए घी, सरसों व तिल के तेल का ही प्रयोग करें. इसलिए कि उक्त तेल दीपदान के लिए लाभकारी माना जाता है. वहीं दीपदान में किरोसिन का तेज निकृष्ट माना गया है.
गुड़, दही, नारियल का है विशेष महत्व
दीपावली के दिन गणेशांबिका पूजन, कलश स्थापन, षोडश्मातृका एवं सप्तघृत मातृका व नवग्रह पूजन कर गणेश सहित महालक्ष्मी, कुबेर, महाकाली, सरस्वती पूजन आदि का विधान है. प्राचार्य पांडेय ने बताया कि स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए इस दिन श्रीसूक्त, पुरुषसुक्त, कनकधारा व स्तोत्र आदि का पाठ करना श्रेयस्कर होता है. पूजा में कमलपुष्प, कमलगट्टा, हल्दी गांठ, धनिया, मजीठा, गुड़, दही, नारियल का का महत्व है.
लक्ष्मी पूजन के शुभ मुहूर्त इस प्रकार है
लक्ष्मी पूजन के लिए कुंभ लग्न में मुहूर्त दिन 2.17 से 3.48 बजे तक है. वहीं वृष लग्न में सायं 6.55 से 8.52 तक लक्ष्मी पूजन का मुहूर्त है. जबकि सिंह लग्न में मुहूर्त रात्रि 1.23 से 3.37 तक सर्वोत्तम है.
बुद्धिजीवियों ने कहा, पहले जैसी नहीं होती दिवाली
आभाष ठाकुर ने बताया कि दिपावली जैसे पर्व पर आधुनिकता का बोल-बाला है. पहले लोग सपरिवार घर के मुहानें, गौशाला आदि जगहों पर दिए जलाते थे. लेकिन, यह परंपरा धीरे-धीरे खत्स सा हो गया है. हमें इस परंपरा को निर्वहन करने के साथ जीवंत करने की भी जरूरत है.
रोटरी क्लब के सचिव इ. विभूतिनारायण सिंह कहते हैं कि पहले एक पखवारे पूर्व से दिवाली की तैयारी शुरू हो जाती थी. सभी लोग एकत्रित होकर घरों की साफ-सफाई करते थे. बहने अपने भाई के दिर्घायु की कामना के लिए घरोंदे बनाती थी. शाम पहर इसमें मूढ़ी व बताशा भरा जाता था. वो अब विलुप्त होती जा रही है.
दीपेश तिवारी कहते हैं कि आधुनिकता व तकनीक के जमाने ने दीपावली पर्व के रंग व रूप को बदल दिया है. हमें बदलते जमाने के साथ परंपराओं का बखूबी निर्वहन करना होगा. क्योंकि, यह हमारे परंपरा का हिस्सा है.
अविनाश कुमार कहते हैं कि परंपरा पर आधुनिकता हावी है. पहले लोग घरों के साज-सज्जा के सामान खुद तैयार करते थे. लेकिन, अब बाजार पर आर्शित रहते हैं. वहीं घी, सरसो के तेल आदि में जलने वाले दीपक की जगह बिजली की छोटे बल्ब व केरोसिन ने स्थान ले लिया है.
रूपनारायण सिंह कहते हैं कि पहले और अब कि दीपावली में खासा फर्क आ गया है. क्योंकि, आधुनिकता हावी है. उत्सव कोई नहीं मना रहा है, बल्कि अब लोग परंपरा को ढो रहे हैं. पहले खेत व खलिहानों में लोग दीये जलाते थे.
कन्हैया कुमार कहते हैं कि, आधुनिकता व तकनीक के जमाने में लोगों को बिजली की झालरें आकर्षित कर रही हैं. दीपावली पर घरों में मिट्टी के बर्तनों से सजाने की परंपरा अब औपचारिकता हो गई हैं. पहले लोग खलिहानों में दीये जलाते थे.
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