लोकतंत्र के प्रथम सांसद महाराजा बहादुर कमल सिंह का निधन, 6 वर्षों से चल रहे थे अस्वस्थ

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Jan 2020 11:43 AM

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डुमरांव : लोकतंत्र के प्रथम सांसद और रियासती हुकूमत के अंतिम राजा महाराजा बहादुर कमल सिंह का निधन रविवार की सुबह 5 बजे हो गया. उन्होंने राज परिवार के पुराना भोजपुर स्थित कोठी में अंतिम सांस ली. वे 94 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गये. निधन की खबर जैसे ही मिली पूरे […]

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डुमरांव : लोकतंत्र के प्रथम सांसद और रियासती हुकूमत के अंतिम राजा महाराजा बहादुर कमल सिंह का निधन रविवार की सुबह 5 बजे हो गया. उन्होंने राज परिवार के पुराना भोजपुर स्थित कोठी में अंतिम सांस ली. वे 94 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गये. निधन की खबर जैसे ही मिली पूरे शाहाबाद में शोक की लहर दौड़ गयी. अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ भोजपुर कोठी में उमड़ने लगी. सैकड़ों लोगों ने भोजपुर कोठी पहुंच कर शोकाकुल परिवार को दुख की इस घड़ी में ढांढ़स बंधाते हुए शोक संवेदना व्यक्त की है. उनके निधन पर डुमरांव की मंडियां स्वतः बंद हो गयी.

महाराजा बहादुर विगत 6 वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे. उनका पार्थिव शरीर डुमरांव नगर में भ्रमण करते हुए बांके बिहारी मंदिर स्थित मार्बल हॉल में रखा जायेगा, जहां शहरवासियों के साथ-साथ राजनीतिक हस्तियां और प्रशासनिक अधिकारी अंतिम दर्शन के बाद पुष्पांजलि अर्पित करेंगे. पूर्व सांसद का अंतिम संस्कार सोमवार की दोपहर बक्सर के चरित्रवन घाट पर किया जायेगा.

1952 में बने थे प्रथम सांसद
लोकतंत्र का पहला चुनाव 1952 में संपन्न हुआ. महाराजा बहादुर पहली बार बक्सर संसदीय क्षेत्र से इस चुनाव में विजय का पताका फहराया. उस वक़्त इनकी उम्र 26 साल थी. दूसरी बार 1962 मे भी बक्सर से विजयी रहे. संसद में पहुंचने के बाद कमल सिंह की कार्यशैली एक तुर्क नेता के रूप में रही. सामाजिक सरोकार से जुड़े हर सवालों को वें बेबाक सदन में रखते थे. हालांकि बाद के दौर में इन्हें हार का सामना करना पड़ा.

1989 में भाजपा ने किया सिंबल
राजनीति के लंबी वनवास के बाद कमल सिंह भाजपा में कमल का सिंबल दिया. बक्सर संसदीय लोकसभा सीट से वे 1989 में चुनाव लड़े लेकिन चुनाव परिणाम में सीपीआई के तेज नारायण सिंह ने इस सीट पर कब्जा जमाया. दूसरी बार 1991 मे भाजपा ने सिंबल देकर चुनाव लड़वाया लेकिन इस चुनाव में भी इन्हें हार का सामना करना पड़ा. चुनाव परिणाम में कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रो. केके तिवारी ने इस सीट पर विजय का पताका लहराया. उसके बाद से वे राजनीति में नहीं आये, लेकिन राजपरिवार से जुड़े सभी परिवारों का भाजपा के प्रति रुझान बना रहा.

शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी के थे मसीहा
पूर्व सांसद कमल सिंह अपने जीवन में शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी के प्रति हमेशा सचेत रहते थे. उन्होंने महाराजा कॉलेज आरा, राज हाइस्कूल डुमरांव, महारानी उषारानी बालिका उच्च विद्यालय और मध्य विद्यालय डुमरांव के लिए जमीन देकर इसकी नींव रखी और शिक्षा का लौ जलाया. इसके साथ ही प्रताप सागर मेथोडिस्ट हॉस्पिटल, डुमरांव राज अस्पताल, बिक्रमगंज राज अस्पताल की सुविधा दी तथा किसानों के लिए नहर और सरोवर बनाया. इस इलाके की मुख्य नदी कांव किसानों के लिए वरदान साबित हुई.

मंदिरों से बनी डुमरांव लहुरी काशी
डुमरांव और आसपास के इलाके में राजपरिवार ने दर्ज़नो मंदिरों की स्थापना की. इन मंदिरों में राजगढ़ स्थित बांके बिहारी मंदिर प्राचीन धरोहरों में एक है. राज घराने के कई इमारतें आज भी अपनी पुरानी यादें संजोये है. बाबा जंगलीनाथ महादेव मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए एक अनूठा मंदिर है. शहर के कई अन्य मंदिरों की आधारशिला राजपरिवार ने रखी, जिससे डुमरांव लहुरी काशी के रूप में जाना जाता है.

आज की राजनीति तथा जन सेवकों से खिन्न रहते थे महाराज
लोकसेवा के क्षेत्र में उनका अवदान अत्यंत प्रेरक एवं बेमिसाल है. आदर्श सांसद एवं जनसेवक के दुर्लभ गुणों से समन्वित उनका व्यक्तित्व अत्यंत उद्दात एवं चरित्र उज्ज्वल है. जो आज भी देश दुनिया की खबर रखते थे. आज की राजनीति एवं समाज में आयी गिरावट सार्वजनिक धन का दुरुपयोग तथा लूट- खसोट से महाराजा को अपने को जनसेवक कहने वाले प्रतिनिधियों, व्यक्तियों से बेहद तकलीफ होती थी. भारतीय संसद की गरिमा को गर्त में मिलाने को आतुर संसद सदस्यों के कार्यों से वो खिन्न रहा करते थे. पिछले कई दिनों से स्थानीय लोगों द्वारा सांसद को आदर्श प्रतिमूर्ति बता कर सरकार द्वारा भारत रत्न सम्मान प्रदान करने की मांग की जाती रही थी.

स्वास्थ्य, शिक्षा हर क्षेत्र में है महाराज का योगदान
स्वातंत्रयोत्तर भारत के विकास के मद्देनजर महाराजा ने मुक्त हस्त से शिक्षा, स्वास्थ्य के प्रमुख क्षेत्रों में अमिट दान दिया जिसमें उन्होंने पुरानी संस्थाओं को दान तो दिया ही तथा नयी संस्थाओं को भी खड़ा किया है, अपने क्षेत्र (बक्सर, बिहार) के बाहर आरा, सासाराम के अतिरिक्त उत्तरप्रदेश के क्षेत्रों में उन्होंने प्रशंसनीय सेवा कार्य किया है. इसके अलावे समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं से आमजन को राहत भी पहुंचाई है.

देश की आजादी के बाद भारत के विकास के लिए महाराजा कमल सिंह ने पुराने शाहाबाद जिला (अब बक्सर, सासाराम, भोजपुर, कैमूर) के अलावा उतर प्रदेश के इलाके में खास तौर पर शिक्षा एवं स्वास्थ के क्षेत्र में मुक्त हस्त से दान देने का काम किया है. उदाहरण के तौर पर बिहार के बक्सर जिले के प्रतापसागर स्थित टीबी अस्पताल वही कुछ ही दूरी पर डुमरांव अनुमंडल के डुमरांव में डुमरांव राज अस्पताल, नगर में मौजूद दो बालिका विद्यालय सहित आरा का महाराजा कालेज, एचडी जैन कॉलेज सहित दर्जनों स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, मंदिर, मठ-मठिया सहित कई अन्य संस्थान हैं. भारतीय संसद के स्वर्णिम काल (1952-1962) के माननीय सदस्य रहे महाराजा श्री सिंह देश के एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे जो 94 वर्ष की उम्र में स्थानीय सहित उनके चाहने वालों के दिलों में बैठे हुए हैं. उनके निधन से सभी को गहरा आघात पहुंचा है.

29 सितंबर 1926 को हुआ था जन्म 5 जनवरी 2020 को ली अंतिम सांस
आपको बता दें कि महाराजा कमल सिंह का जन्म 29 सितंबर, 1926 को डुमरांव राजगढ़ में हुआ था. महाराजा बहादुर रामरण विजय प्रसाद सिंह एवं महारानी कनक कुमारी की प्रथम संतान के रूप में कमल सिंह के जन्म होने पर काफी खुशियां मनायी गयी थी. महाराज कमल सिंह की आरंभिक शिक्षा देहरादून स्थित कर्नल ब्राउन्स कैम्ब्रिज स्कूल से पूरी हुई थी. महाराजा बहादुर कमल सिंह की शादी उत्तर प्रदेश के रायबरेली स्थित तिलई इस्टेट के राजा विश्वनाथ प्रसाद सिंह की पुत्री उषा रानी के साथ संपन्न हुई थी. रविवार 5 जनवरी 2020 की सुबह 5:10 पर उन्होंने अंतिम सांस ली. महाराजा अपने पीछे दो पुत्रों में युवराज चंद्रविजय सिंह व वधू कनिका सिंह एवं छोटे युवराज मानविजय सिंह व पुत्रबधु अरूणिका सिंह सहित पोता व पोतियो से भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं.

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