राजगीर मलमास मेले में मोक्ष की कामना के लिए 'गाय की पूंछ' पकड़कर वैतरणी नदी पार कर रहे लाखों श्रद्धालु, देखें तस्वीरें!
Published by : Aditya Kumar Ravi Updated At : 07 Jun 2026 3:42 PM
गाय की पूंछ पकड़ कर वैतरणी नदी पार करते श्रद्धालु
Rajgir Malmas Mela: राजगीर पुरुषोत्तम मास मेले में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब. मोक्ष और आत्मिक शुद्धि की कामना के साथ श्रद्धालु गाय की पूंछ पकड़कर पार कर रहे हैं वैतरणी नदी. जानें क्या है इसके पीछे की पौराणिक मान्यता.
Rajgir Malmas Mela(रामविलास): विश्व प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पुरुषोत्तम मास (मलमास) मेले के दौरान राजगृह (राजगीर) की पावन धरती पर आस्था, विश्वास और सनातन संस्कृति का एक बेहद अद्भूत और अलौकिक नजारा देखने को मिल रहा है. यहाँ स्थित मोक्षदायिनी वैतरणी नदी के तट पर सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा को निभाने के लिए देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है. चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बावजूद प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए पूरी श्रद्धा के साथ गाय की पूंछ पकड़कर वैतरणी नदी को पार कर रहे हैं.

आखिर क्यों पकड़ी जाती है गाय की पूंछ? जानिए इसके पीछे का गूढ़ रहस्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैतरणी नदी को पार करने वाले इस पवित्र अनुष्ठान से मनुष्य को सांसारिक बंधनों और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है. माना जाता है कि इस विधि से नदी पार करने पर जीवन में अनजाने में हुए पापों का नाश होता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है. इस अनूठी परंपरा में हिस्सा लेने के लिए पुरुष श्रद्धालुओं के साथ-साथ महिला भक्तों की संख्या विशेष रूप से काफी अधिक देखी जा रही है. तट पर सबसे पहले विद्वान पुरोहितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ संकल्प कराया जाता है, जिसके बाद पूजा-अर्चना कर श्रद्धालु गाय की पूंछ थामकर नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक जाते हैं.

पद्मपुराण में भी है इस पावन परंपरा का जिक्र, गूंज रहे हैं विष्णु के जयकारे
अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्ट्रीय प्रचार मंत्री सुधीर कुमार उपाध्याय एवं तीर्थ पुरोहित संजय कुमार पांडेय ने इस परंपरा के आध्यात्मिक महत्व पर रोशनी डाली. उन्होंने बताया कि पद्मपुराण समेत अन्य पवित्र पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथाओं के अनुसार, वैतरणी नदी को पार करना सीधे तौर पर आत्मिक शुद्धि और परम पुण्य अर्जन से जुड़ा हुआ है. संत-महात्माओं का भी मानना है कि गाय को सनातन धर्म में साक्षात मातृस्वरूप और बेहद पवित्र माना गया है, इसलिए उसका सहारा लेकर इस वैतरणी को पार करना भक्तों को जीवन में करुणा, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.

मेला क्षेत्र में सुबह से लेकर शाम तक वैदिक मंत्रों की गूंज और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था ने पूरे वातावरण को पूरी तरह भक्तिमय बना दिया है. पुरुषोत्तम मास में इस अनूठी परंपरा का हिस्सा बनने के लिए बिहार ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालु राजगीर पहुंच रहे हैं और अपने परिवार के लिए सुख, शांति, समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की कामना कर रहे हैं. सदियों पुरानी यह जीवंत परंपरा आज भी आधुनिक दौर में सनातन संस्कृति की एक मजबूत पहचान बनी हुई है.
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