सिलाव के बड़ाकर गांव में मनायी गयी इर्द

स्थानीय सिलाव में ईद मनाने की एक अनोखी परंपरा आज भी कायम है. जिले के कुछ गांवों में ईद की तारीख भारत में चांद दिखने के आधार पर नहीं, बल्कि सऊदी अरब में चांद नजर आने की खबर पर तय की जाती है.
सिलाव, स्थानीय सिलाव में ईद मनाने की एक अनोखी परंपरा आज भी कायम है. जिले के कुछ गांवों में ईद की तारीख भारत में चांद दिखने के आधार पर नहीं, बल्कि सऊदी अरब में चांद नजर आने की खबर पर तय की जाती है. सिलाव प्रखंड क्षेत्र के बड़ाकर गांव सहित आसपास के कई गांवों में जैसे ही सऊदी अरब से चांद दिखने की पुष्टि मिलती है, लोग तुरंत ईद की तैयारियों में जुट जाते हैं. इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. देश के अन्य हिस्सों से एक दिन पहले ही इन गांवों में लोग ईद का त्योहार मनाने लगे. स्थानीय लोग बताते हैं कि सऊदी अरब में चांद दिखने को विशेष महत्व दिया जाता है, इसलिए वे उसी के अनुसार रोजा खत्म कर ईद मनाते हैं. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है. ईद के दिन सुबह-सुबह मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज अदा की गई. इसके बाद लोग एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद देते हैं. बच्चों और युवाओं में खास उत्साह देखने को मिलता है. घरों में सेवइयां और अन्य पकवान बनाए गए, जबकि रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाकर खुशियां साझा की गई. हालांकि अलग तारीख पर ईद मनाने के बावजूद प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा. स्थानीय स्तर पर शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की गईं, ताकि त्योहार शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो. नालंदा के इन गांवों में ईद का यह अलग अंदाज न सिर्फ धार्मिक आस्था को दर्शाता है, बल्कि सामाजिक सौहार्द की मिसाल भी पेश करता है. अलग तारीख पर त्योहार मनाने के बावजूद सभी समुदायों के बीच भाईचारा और आपसी प्रेम कायम रहता है.
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