नालंदा में 38% आंगनबाड़ी केंद्र किराये के भवनों में संचालित, गुणवत्ता पर सवाल
Published by : Rajeev Kumar Updated At : 05 Jun 2026 8:12 AM
आंगनबाड़ी केंद्र का फोटो.
Nalanda News : 765 आंगनबाड़ी केंद्र सामुदायिक भवन, पुस्तकालय एवं अन्य सरकारी भवनों में संचालित हो रहे हैं, जबकि 431 केंद्र स्थानीय विद्यालयों में चल रहे हैं.
Nalanda News : (कंचन कुमार की रिपोर्ट)
नालंदा जिले में आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए स्थायी भवनों की कमी अब भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है. जिले के कुल 3417 आंगनबाड़ी केंद्रों में से 1348 केंद्र ही अपने भवनों में संचालित हो रहे हैं, जबकि 1304 केंद्र किराये के भवनों पर निर्भर हैं. यानी 38 प्रतिशत केंद्र किराये के भवन पर निर्भर है.
इसके चलते बच्चों को मिलने वाली पोषण, शिक्षा और देखभाल सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है.
431 केंद्र स्कूलों में चल रहे
आंकड़ों के अनुसार 765 आंगनबाड़ी केंद्र सामुदायिक भवन, पुस्तकालय एवं अन्य सरकारी भवनों में संचालित हो रहे हैं, जबकि 431 केंद्र स्थानीय विद्यालयों में चल रहे हैं. इस तरह जिले के 60 प्रतिशत से अधिक केंद्रों के पास अपना स्वतंत्र भवन उपलब्ध नहीं है.
बिहारशरीफ शहरी, यहां 206 में से सिर्फ एक केंद्र के पास अपना भवन
बिहारशरीफ शहरी परियोजना की स्थिति और भी खराब है, जहां 206 केंद्रों में से मात्र एक केंद्र ही अपने भवन में संचालित हो रहा है. यहां 188 केंद्र किराये के भवनों में चल रहे हैं. इसके विपरीत बिहारशरीफ ग्रामीण क्षेत्र में 258 में से 154 केंद्रों के पास अपने भवन उपलब्ध हैं.
किराये के भवनों में बुनियादी सुविधाओं की कमी
किराये के भवनों में संचालित कई केंद्रों में बच्चों के लिए पर्याप्त स्थान, शुद्ध पेयजल, बिजली, शौचालय और सुरक्षित वातावरण जैसी सुविधाओं का अभाव है. कई केंद्र ऐसे भवनों में चल रहे हैं जो सुरक्षा के मानकों पर भी खरे नहीं उतरते। इससे बच्चों की सुरक्षा और पोषण सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.
भवन निर्माण की रफ्तार धीमी
चार वर्ष पूर्व मनरेगा के तहत आंगनबाड़ी भवन निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन प्रगति अपेक्षित नहीं रही. जिले में स्वीकृत 218 भवनों में से केवल 92 भवनों का निर्माण पूरा हुआ है, जबकि दो भवन निर्माणाधीन हैं. इस प्रकार चार वर्षों में मात्र 42.20 प्रतिशत लक्ष्य ही हासिल हो सका है.
निर्मित 92 भवनों में से 80 भवन आईसीडीएस विभाग को हस्तांतरित किए जा चुके हैं, जबकि शेष भवनों का हस्तांतरण लंबित है.
मानव संसाधन की कमी भी बड़ी समस्या
आईसीडीएस व्यवस्था में पर्यवेक्षिकाओं के 127 स्वीकृत पदों में से 67 पद ही भरे हुए हैं, जबकि लगभग 47 प्रतिशत पद रिक्त हैं. सेविका के 3211 स्वीकृत पदों में 206 और सहायिका के 2984 पदों में 433 पद खाली पड़े हैं.
योजनाओं पर पड़ सकता है असर
आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक पोषाहार, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच, पोषण शिक्षा, प्री-स्कूल शिक्षा, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं संचालित की जाती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भवन और मानव संसाधन की कमी का सीधा असर इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर पड़ सकता है.
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