हादसे ने छीन ली श्रीभगवान के घर की खुशी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :22 Nov 2016 6:16 AM (IST)
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कानपुर रेल हादसा . सोमवार की देर शाम गांव पहुंचा मृतक का पार्थिव शरीर, उमड़ी ग्रामीणों की भीड़ श्रीभगवान के कंधे पर थी परिवार चलाने की जिम्मेवारी आरा : इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन हादसे ने चंद मिनट में कइयों के सुहाग उजाड़ दिये, तो कइयों को अनाथ कर दिया. इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे में भोजपुर के भी […]
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कानपुर रेल हादसा . सोमवार की देर शाम गांव पहुंचा मृतक का पार्थिव शरीर, उमड़ी ग्रामीणों की भीड़
श्रीभगवान के कंधे पर थी परिवार चलाने की जिम्मेवारी
आरा : इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन हादसे ने चंद मिनट में कइयों के सुहाग उजाड़ दिये, तो कइयों को अनाथ कर दिया. इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे में भोजपुर के भी एक घर की खुशी सदा के लिए छिन गयी. अब उस घर में कुछ बचा है तो सिर्फ श्री भगवान सिंह की यादें. अपने साला के शादी सामारोह में शामिल होने के लिए इंदौर से कोइलवर थाना क्षेत्र के सकड्डी गांव आ रहे थे लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. श्री भगवान सिंह इंदौर के सिनोरियम इंडिया कंपनी में सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत थे. गांव से लेकर मृतक के ससुराल तक मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है. कल तक जहां शादी की मांगलिक गीत गाये जा रहे थे.
वहां मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है. देर शाम उदवंतनगर थाना क्षेत्र के रामनगर टोला गांव श्री भगवान सिंह का शव पहुंचा. शव पहुंचते ही ग्रामीणों की भीड़ उमड़ पड़ी. मृतक की पत्नी किरण और बेटी का रो-रो कर बुरा हाल हो गया है. परिजनों के चीत्कार से पूरा माहौल गमगीन हो गया था.
मुझे मेरे पिता को ला दो बस, कोई तो उन्हें उठाये : जैसे ही श्री भगवान सिंह का शव घर पहुंचा बेटी सीमा ने कहा की मेरे पापा को कोई तो उठाये मेरे पापा को भगवान एक बार ला दो. इसके बाद मैं आपसे कभी कुछ नहीं कहूंगी. भीड़ से इस तरह सवाल कर रही बच्ची का जवाब किसी के पास नहीं थी. उसकी बात सुनकर सभी की आंखें भर आयीं.
पिया का छूट गया साथ : सोमवार को सुबह से ही नवादा बेन गांव के रामनगर के टोला में मातमी माहौल दूर से ही दिखाई दे रहे थे. चुपचाप लोगों के कदम गांव की तरफ बढ़ रहे थे. लोगों की टकटकी निगाहें एक-दूसरे को आते जाते देख रही थी. गांव के बाहर खड़े लोग श्रीभगवान के शव के आने का इंतजार कर रहे थे. उन्हें पता था कि झांसी के समीप ट्रेन दुर्घटना में श्रीभगवान नहीं रहे. लोग श्रीभगवान के घर के पास जाने से कतरा रहे थे क्योंकि उस घर से निकल रही करुणा वेदी रोने की आवाजे लोगों से दया की भीख मांग रही. किसी के रोने में यह दर्द भरी आवाज थी कि मेरे पिया को लौटा दो, तो कोई अपने पिता के लिए आंसू बहाये जा रहे थे. अपने अरमानों को सजाएं बेटियों ने रोते हुए यहां तक कह रही थी मुझे कुछ नहीं चाहिए मेरे पिता को लौटा दो. यह सब सुन कर सब का कलेजा फट पड़ा. तभी एक वाहन गांव में प्रवेश करता है. लोगों के कदम भी उस वाहन के पीछे-पीछे चल पड़ते हैं. शव को जैसे ही वाहन से उतारा जाता है. उस गांव का शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसकी आंखें नहीं भीगी होंगी. लोगों की करुणा और भी दिल में दर्द उठा रही थी जब वह श्रीभगवान की चारों बेटियां रूनी, सीमा, जूही व मनीषा को देख रहे थे. पिता को अरथी पर लेटा देख चारों बेटियां दहाड़ मार- मार कर रोने लगी दृश्य ने सब को हिला कर रख दिया था. विक्रांत जो कि श्री भगवान का सबसे बड़ा लड़का था. रास्ते भर अपने पिता से लिपट कर रोते आया था. वह एक बार फिर टूट गया, जब अपनी मां किरण देवी को लिपट कर रोते देखा.
रुनी का टूट गया अरमान, सीमा जूही व निशा के नहीं रुक रहे आंसू : श्री भगवान की सबसे बड़ी लड़की का नाम रुनी है. ट्रेन हादसे से चंद घंटे पहले श्री भगवान ने फोन पर रुनी से कहा था. बेटा मन लगा कर पढ़ो. तुम्हारे सपने को मैं जरूर पूरा करूंगा. यह कहते-कहते रुनी और परेशान हो जाती है. उसके आंसुओं की धारा है रुकने का नाम ही नहीं ले रहा. वह रोते रोते कहती है बस वापस लौट आव पापा ….अपनी बड़ी बहन को रोते देख सीमा जूही निशा फफक फफक कर रो पड़ती है. पापा हो पापा कहां गईलअ हो पापा…
अरमान नहीं हुआ पूरा
ट्रेन पकड़ने के पहले टेलीफोन पर श्रीभगवान ने अपनी पत्नी किरण से कहा यहीं से साड़ी ले ले रहा हूं. किरण ने कहा रहने दीजिए जी आरा से बाजार चल कर साड़ी खरीद लिया जायेगा. मगर होनी ने ऐसा होने नहीं दिया. न साड़ी ही आयी, न ही अपने पिया के साथ किरण बाजार गयी. नौकरी से लौटने पर देखने की भी तमन्ना धरी- की- धरी रह गयी. बस श्रीभगवान से लिपट कर किरण, रुनी, सीमा, जूही, निशा और विक्रांत दहाड़े मार-मार कर रोये जा रही थी और लोगों से बस यही पूछते रहे कि आखिर इनका क्या कसूर था…
सरकार की तरफ से नहीं मिला कोई अनुदान, अपने पैसे से लाया गया शव : ट्रेन हादसे में मारे गये लोगों को केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तरफ से मुआवजे की घोषणा की गयी थी लेकिन श्रीभगवान सिंह का शव लाने के लिए परिजनों को अपने पास से पैसा देना पड़ा.
अब तक किसी प्रकार का मुआवजा नहीं दिया गया है. इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि सरकार के दावे और जमीनी हकीकत कुछ और है. घरवालों ने 16000 रुपया शव को लाने के लिए एंबुलेंस वाले को दिया. शव को लाने पहुंचे मुखिया दिलीप राम ने बताया कि शव को ढूंढ़ने में एक घंटे से ज्यादा का समय लग गया. अंतिम संस्कार बक्सर के श्मशान घाट पर किया गया.
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