298 के बदले 400 में बिक रही खाद

आरा : किसान बेचारे खेती के दौरान पटवन की समस्या से अभी थोड़ी राहत की सांस ही ले पाये थे कि खाद की कालाबाजारी और किल्लत ने एक बार फिर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी है. किसानों की समस्या से नहरों में पानी नहीं रहने के दिनों में भी इसी प्रकार से जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारी […]
आरा : किसान बेचारे खेती के दौरान पटवन की समस्या से अभी थोड़ी राहत की सांस ही ले पाये थे कि खाद की कालाबाजारी और किल्लत ने एक बार फिर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी है. किसानों की समस्या से नहरों में पानी नहीं रहने के दिनों में भी इसी प्रकार से जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारी बेखबर थे.
जिस प्रकार से इन दिनों खाद की कालाबाजारी और किल्लत की समस्या से अनजान बने हुए हैं. इसको लेकर किसानों के बीच प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ गुस्सा फूटने के कगार पर पहुंच गया है. यदि खाद की कालाबाजारी और किल्लत को दूर करने को ले सांसद, विधायक और जिला प्रशासन समय रहते कृषि विभाग के अधिकारी और खाद व्यवसायियों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई के लिए कदम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिनों में किसान खाद को लेकर आंदोलन करने को मजबूर हो जायेंगे.
इन दिनों भोजपुर जिले में 298 के बजाय 380 से 400 रुपये प्रति बोरा यूरिया मिल रहा है. यही नहीं पिछले दिनों जिला बीस सूत्री कार्यक्रम एवं क्रियान्वयन समिति की बैठक में जिला कृषि पदाधिकारी द्वारा बताया गया था कि अगस्त माह तक भोजपुर जिले को 27 हजार एमटी यूरिया मांग के विरुद्ध 22 हजार एमटी यूरिया उपलब्ध करा दी गयी है.
शेष यूरिया की मांग की गयी है. सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिले में धान रोपनी का कार्य देर से शुरू हुआ. यानी अगस्त माह तक धानरोपनी का कार्य हुआ है. ऐसे में किसानों द्वारा सिर्फ डीएपी और एनपीए जैसी मिश्रित खाद का धान रोपनी के समय उपयोग किया जाता है तो फिर यूरिया खाद की उपलब्धता के बावजूद आखिरकार यूरिया खाद अचानक जिले से गया कहां .
सूत्रों की मानें तो भोजपुर जिले के कोटे का यूरिया कृषि विभाग की मिलीभगत से रोहतास, कैमूर और बक्सर सहित अन्य जिलों में ऊंची कीमत पर बेच दी गयी, जबकि जिले में जब यूरिया खाद की जरूरत शुरू हुई तो 298 के बदले 400 पर मिल रही है. आखिर इसके लिए जिम्मेवार कौन है.
यूरिया की किल्लत क्यों
भोजपुर जिले के किसान धान रोपनी के समय मिश्रित खाद के साथ यूरिया खाद का नाम मात्र का कोई-कोई किसान द्वारा प्रयोग किया जाता है. तो, फिर जिले को अगस्त माह के कोटे की खाद कहां गयी.
यदि खाद कहीं गयी भी तो इसके लिए जिम्मेवार कौन है. क्या बार-बार इस लापरवाही और जमाखोरी का किसान ही बलि चढ़ेंगे. क्या इसके जिम्मेवार पदाधिकारी और लाइसेंसधारी व्यवसायियों के विरुद्ध प्रशासन कब तक कार्रवाई करेगा. उल्लेखनीय है कि जिले में धान की फसल लगाये जाने के 20 से एक माह के बाद धान फसल से घास निकालने के बाद किसान प्रति कट्ठा डेढ़ से दो किलो तक यूरिया खाद का प्रयोग करते हैं.
ऐसे में जिले में जुलाई और अगस्त माह में यूरिया खाद की मांग नहीं के बराबर होती है. यूरिया खाद की मांग सितंबर और अक्तूबर माह में अधिक होती है. जैसे ही यूरिया खाद की मांग का मौसम शुरू हुआ तो बाजार से यूरिया गायब हो गया. नीम कोटेड यूरिया का सरकारी मूल्य 298 रुपये निर्धारित है, जो फिलहाल बाजार में 380 से 400 तक में मिल रहा है.
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