पिता के साथ मजदूरी करते हुए संसद में पहुंचे रामेश्वर
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :01 May 2018 5:59 AM (IST)
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आरा : खेलने व पढ़ने की उम्र में पिता के साथ ईंट की भट्ठियों में बचपन गुजारने वाले रामेश्वर प्रसाद मजदूरी करते हुए देश की संसद तक का सफर तय कर चुके हैं. 1989 से 91 तक वे आरा के सांसद रहे और 1995 व 2005 में संदेश से विधायक चुने गये. हालांकि 2005 में […]
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आरा : खेलने व पढ़ने की उम्र में पिता के साथ ईंट की भट्ठियों में बचपन गुजारने वाले रामेश्वर प्रसाद मजदूरी करते हुए देश की संसद तक का सफर तय कर चुके हैं. 1989 से 91 तक वे आरा के सांसद रहे और 1995 व 2005 में संदेश से विधायक चुने गये.
हालांकि 2005 में चुनाव जीतने के बाद वो शपथ नहीं ले सके थे, क्योंकि तत्कालीन राज्यपाल ने उस समय हुए चुनाव को रद्द कर दिया था. रामेश्वर प्रसाद फिलहाल पटना के बिहटा में रहते हैं. गरीबी व बेवसी की वजह से उन्होंने महज मैट्रिक तक की ही पढ़ाई की है. वे शुरू से ही खेत-मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे. इसके लिए कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा. इसी वजह से जनता ने उन्हें भोजपुर की आवाज को बुलंद करने के लिए संसद में भेजा था. हालांकि उस समय देश में चल रही राजनीतिक उठा-पटक की वजह से ज्यादा समय तक वे एमपी नहीं रहे.
जेपी आंदोलन में गये थे जेल : युवा अवस्था में ही पिता राधे नोनिया के साथ मजदूरी करते हुए अपने परिवार का पालन-पोषण की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. इसी बीच उन्होंने 1974 में हुए जेपी आंदोलन में भाग लिया. इस दौरान फुलवारी शरीफ, बांकेपुर व हजारीबाग कैंट जेल में भी रहे. इसके बाद से ही उनमें देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा हुआ. आईपीएफ में अध्यक्ष से लेकर जेनरल सेक्रेटरी का पद संभाल चुके प्रसाद इस समय उम्र ज्यादा होने की वजह से सीपीआई एमएल की स्टेट कमेटी में हैं. उनका बेटा भी राजनीति में सक्रिय है.
मार्क्सवाद के किताब ने बदली जिंदगी
रामेश्वर प्रसाद ने बताया कि जेल में रहने के दौरान उन्हें मार्क्सवाद की पुस्तक पढ़ने का मौका मिला. मार्क्सवाद के कई किताबों का उन्होंने अध्ययन किया. लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जब वे छुटे, तो मजदूरों की आवाज के लिए जोरदार तरीके से संघर्ष करना शुरू कर दिया और संघर्ष के बल पर ही संसद तक का सफर तय किया.
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