Bhagalpur news गंगा मुक्ति आंदोलन की 44वीं वर्षगांठ पर नौका जुलूस व दीपदान

कहलगांव कागजी टोला स्थित काली घाट पर रविवार को गंगा मुक्ति आंदोलन की 44वीं वर्षगांठ मनायी गयी.
कहलगांव कागजी टोला स्थित काली घाट पर रविवार को गंगा मुक्ति आंदोलन की 44वीं वर्षगांठ मनायी गयी.आमसभा, विचार गोष्ठी, नौका जुलूस व दीपदान सहित कई कार्यक्रम हुए. अध्यक्षता डॉ फारूक अली व संचालन योगेंद्र सहनी ने किया. वक्ताओं ने बताया कि गंगा मुक्ति आंदोलन की शुरुआत 22 फरवरी 1982 को हुई थी. आंदोलन के बाद सुलतानगंज से पीरपैंती तक लगभग 80 किलोमीटर क्षेत्र में जमींदारी प्रथा समाप्त हुई, पारंपरिक मछुआरों के लिए नदियों को करमुक्त किया गया तथा शंकरपुर दियारा की 517 बीघा बेनामी जमीन भूमिहीन परिवारों में वितरित की गयी. वर्तमान समय में डॉल्फिन संरक्षण, फरक्का बराज, नदी प्रदूषण, मछलियों की घटती संख्या, कटाव और विस्थापन जैसी समस्याओं से मछुआरा समुदाय की आजीविका प्रभावित हो रही है. मुख्य अतिथि कोलकाता से आयी जया मित्र ने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की पहचान है. झारखंड ग्राम सभा फेडरेशन के प्रतिनिधि मधुपुर के घनश्याम ने आंदोलन को एकता और संघर्ष का प्रतीक बताया. उदय जी ने फ्री फिशिंग एक्ट लागू करने तथा कटाव पीड़ित एवं भू-विस्थापित परिवारों के पुनर्वास से संबंधित प्रस्ताव पारित करने की जानकारी दी. मछुआरा आयोग की सदस्य रेनू सिंह व डॉ योगेंद्र ने गंगा के बढ़ते पर्यावरणीय संकट पर चिंता व्यक्त की. डॉ. फारूक अली ने कहा कि बक्सर से साहिबगंज के बीच लगातार बन रहे पुलों से गंगा की चौड़ाई घट रही है, जिससे जल संकट गहराने की आशंका है. सभा को समस्तीपुर के बलराम चौरसिया, सारण से राजाराम सहनी, कोलकाता के मिलन दास, मालदा के अनवर, रवींद्र पासवान, रोहित कुमार, महाराष्ट्र से आशा प्रदीप सिन्हा, नवज्योति पटेल तथा नरेश सिंह सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने संबोधित किया. कार्यक्रम के समापन पर काली घाट से राजघाट तक भव्य नौका जुलूस निकाला गया. महिलाओं एवं बालिकाओं ने गंगा नदी में 351 दीप प्रवाहित कर नदी संरक्षण एवं पर्यावरण बचाने का संकल्प लिया.
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