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आमापुर गांव के पास नदी में बह कर आया मेढ़, तब से हो रही मां दुर्गा की पूजा

Updated at : 07 Oct 2024 12:37 AM (IST)
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आमापुर गांव के पास नदी में बह कर आया मेढ़, तब से हो रही मां दुर्गा की पूजा

आमापुर में मां दुर्गा के मंदिर की स्थापना सबसे पहले हुई थी

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आमापुर में मां दुर्गा के मंदिर की स्थापना सबसे पहले हुई थी. यहां माता के वैष्णव स्वरूप की पूजा होती है. ग्रामीण श्रद्धा से ग्राम देवी के रूप में पूजा करते हैं. ग्रामीणों के अनुसार शारदीय नवरात्र में करीब 74 वर्षों से प्रतिमा स्थापित कर पूजा होती है. लोगों के अनुसार 1950 में जिउतिया व्रत के समय नदी के बहाव में एक मेढ़ जिस पर प्रतिमा स्थापित होती है आमापुर के सामने नदी तट पर आकर लगी. उस वक्त गांव में डायरिया व हैजा महामारी फैली थी. नदी किनारे मेढ़ को ग्रामीणों ने ईश्वरीय संकेत मान उस पर प्रतिमा बनवायी और श्रद्धापूर्वक पूजा अर्चना की. माता की प्रतिमा का विसर्जित होते ही गांव से महामारी समाप्त हो गयी. ग्रामीणों का माता रानी पर श्रद्धा व विश्वास बढ़ गया. दूसरी घटना भी काफी रोचक है. स्थापना के सातवें वर्ष 1957 में जब भारी अकाल पड़ा, तो लोगों ने पूजा में सक्षम न मानकर मेढ़ को नदी में विसर्जित कर पूजा को हमेशा के लिए बंद करना चाहा. कुछ ग्रामीण विसर्जन के लिए मेढ़ को लेकर चले. वह लोग रात भर चलते रहे, लेकिन नदी का किनारा नहीं मिला. सुबह होने से पहले मंदिर लौट आये. तब से अब तक बिना किसी रुकावट यहां माता की पूजा हो रही है. मेला कमेटी के अध्यक्ष रामलाल मंडल ने बताया कि स्थापना के समय से ही यहां तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है. स्थानीय लोग नाटक का भी मंचन करते हैं. भक्तों की मान्यता है कि जो भी भक्त कोई मुराद लेकर आता है माता रानी उनकी मुरादें अवश्य पूरी करती हैं.

स्वतंत्रता सेनानी सियाराम बाबू की अगुवाई में मंदिर की रखी गयी नींव

सुलतानगंज-भागलपुर मुख्य पथ महेशी पंचायत के तिलकपुर दुर्गा मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. पूजा समिति के सदस्य ने बताया कि वर्ष 1941 में मंदिर का निर्माण हुआ. पहला दान पांच रुपये राजा कृष्णानंद की पत्नी ने दिया था. राजा कृष्णानंद की पत्नी मां दुर्गा को खोइछा देती थी. मान्यता है कि तिलकपुर स्थित दुर्गा मंदिर में सच्ची श्रद्धा से पूजा-अर्चना कर कोई भक्त निराश नहीं लौटता है. ग्रामीणों ने बताया कि मंदिर की नींव कूलो प्रसाद महतो ने शेरे बिहार स्वतंत्रता सेनानी सियाराम बाबू की अगुवाई में ग्रामीणों के सहयोग से रखी थी. मंदिर में पहली पूजा सियाराम बाबू ने तांत्रिक विधि से की थी. कुमैठा गांव के सौकी उपाध्याय ने राजा कृष्णानंद की पत्नी को पूजा करने के लिए मंदिर बनवाया था. मंदिर के मुख्य आचार्य ने बताया कि मूर्ति विसर्जन के पहले राजा कुमार कृष्णानंद की पत्नी मां दुर्गा को खोइछा देती थी. मां की कृपा से भक्तों की संख्या हर वर्ष बढ़ रही है. शारदीय नवरात्र में मंदिर में भक्तों की काफी भीड़ जुटती है. दुर्गा सप्तशती के पाठ से भक्ति का माहौल बना हुआ है. दुर्गा मंदिर में काफी संख्या में संध्या आरती करने भक्त पहुंच रहे है.

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