बच्चों के साथ व्यस्कों में भी बढ़ रही है हाइपर एक्टिविटी की समस्या : डाॅ शिल्पी

Published by : MANISH KUMAR Updated At : 11 Jan 2026 9:54 PM

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राजकीय अयोध्या शिव कुमारी आयुर्वेद महाविद्यालय बेगूसराय में आज दो दिनों के राष्ट्रीय सम्मेलन एवं अल्युमिनी मीट के सेमिनार सत्र का समापन हो गया.

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बेगूसराय. राजकीय अयोध्या शिव कुमारी आयुर्वेद महाविद्यालय बेगूसराय में आज दो दिनों के राष्ट्रीय सम्मेलन एवं अल्युमिनी मीट के सेमिनार सत्र का समापन हो गया. रविवार को सुबह वैज्ञानिक सत्र के साथ सेमिनार प्रारंभ हुआ. जिसमें बोलते हुए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो डॉ एसजे गुप्ता ने भगंदर रोग पर विस्तृत रुप से चर्चा करते हुए कहा कि दूषित आहार विहार के कारण दोष विकृत होते हैं. वे विकृत होकर मांस और शोणित को प्रदूषित करते हैं जो बाद में भगंदर रोग में बदल जाता है. आयुर्वेद में हम इसकी शमन चिकित्सा करते हैं.लेकिन आयुर्वेदिक चिकित्सा में अब कुछ एडवांसमेंट भी शामिल हो गया है.उन्होंने कहा कि फिस्टुला के इलाज में मूल कारण को दूर करने का प्रयास करने के साथ-साथ यदि फिस्टुला के लिए शरीर मे कोई अन्य कारण भी मौजूद हैं तो हम उसकी भी चिकित्सा करते हैं. फिस्टुला के मामले में व्रण ही नहीं व्रणी की चिकित्सा भी किया जाना अनिवार्य है. नहीं तो यह रोग दोबारा उत्पन्न हो जाएगा. इसके कारण और रोग दोनों का इलाज सम्यक तरीके से किया जाता है. उन्होंने कहा इस मामले में क्षार सूत्र कर्म का उपयोग किया जाता है. जो विभिन्न पौधे के रस को सूत्र में लगाकर तैयार किया जाता है. वैज्ञानिक सत्र के दूसरी पारी को संबोधित करते हुए सहायक प्राध्यापक डॉ शिल्पी गुप्ता ने बाल रोग के मानसिक विकलांगता पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि बच्चे कभी उग्र हो जाते हैं, कभी शांत हो जाते हैं ,कभी एक ही चीज को बार-बार दोहराने लगते हैं. उन्माद की अवस्था में उन्हें कई तरह के भ्रम होते हैं. कभी-कभी उन्हें डर का अनुभव होता है तो कभी-कभी हंसने लगते हैं.उन्होंने आर्टिज्म के इलाज को प्रभावकारी बताते हुए कहा कि जितनी जल्दी इलाज होगा बच्चा उतनी जल्दी ठीक होगा.एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविट डिसऑर्डर के इलाज में मुख्य रूप से दवाएं उत्तेजक और गैर-उत्तेजक, व्यवहारिक चिकित्सा बिहेवियरल थेरेपी, और कौशल प्रशिक्षण शामिल होते हैं.जो लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं. मल्टीमॉडल दृष्टिकोण, जिसमें दवा और थेरेपी का संयोजन होता है, सबसे प्रभावी माना जाता है, और छोटे बच्चों में माता-पिता का प्रशिक्षण भी जरुरी है. साथ ही आहार और स्क्रीन टाइम प्रबंधन भी सहायक होता है.उम्र के हिसाब से यह वायलोजिकल भी हो सकता है और इनवाइरमेंटल भी हो सकता है.अलग अलग बच्चों अलग अलग तरह के लक्षण दिख सकतें हैं. आज के परिवेश में बच्चों के साथ साथ व्यस्कों में भी हाइपर एक्टिविटी की समस्या बढ़ रही है.आज शाम में द्वितीय सत्र में पूर्ववर्ती छात्र समिति द्वारा अल्युमिनि मीट किया गया. जिसकी अध्यक्षता डॉ लाल कौशल कुमार एवं संचालन डॉक्टर दिलीप कुमार वर्मा ने किया. इसमें डॉक्टर हरिहर प्रसाद सिंह, भूतपूर्व उप निदेशक डॉक्टर अर्जुन सिंह ,डॉ शंभू नाथ शर्मा, डॉ प्रमोद कुमार, डॉ अनिल कुमार डॉ राजेश्वर पोद्दार ,डॉ सुशील कुमार, डॉक्टर एसएन पोद्दार डॉ हरिनंदन पासवान आदि ने पूर्ववर्ती छात्र समिति के सम्मेलन को हर साल करने की सलाह दी. प्राचार्य डॉ श्रीनिवास त्रिपाठी ने आगत सभी पूर्ववर्ती छात्रों का स्वागत करते हुए दूर-दूर के जिला से आने के लिए उन्हें धन्यवाद ज्ञापित किया. इसके पूर्व कल शाम संपन्न हुए वैज्ञानिक सत्र को डॉ बीके द्विवेदी एवं डॉक्टर अनुराधा राय ने संबोधित किया. संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन डॉ मुन्ना कुमार ,डॉ राजीव कुमार शर्मा ,डॉ अनिल कुमार ,डॉ प्रमोद कुमार, डॉ दिनेश कुमार ने किया.

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