मौनी अमावस्या पर सिमरिया में श्रद्धालुओं ने किया गंगा स्नान

Updated at : 18 Jan 2026 9:51 PM (IST)
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मौनी अमावस्या पर सिमरिया में श्रद्धालुओं ने किया गंगा स्नान

रविवार को मौनी अमावस्या के मौके पर विभिन्न जिलों से आये श्रद्धालुओं ने सिमरिया के विभिन्न घाटों पर अहले सुबह से ही गंगा में आस्था की डुबकी लगायी.

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बीहट. रविवार को मौनी अमावस्या के मौके पर विभिन्न जिलों से आये श्रद्धालुओं ने सिमरिया के विभिन्न घाटों पर अहले सुबह से ही गंगा में आस्था की डुबकी लगायी. स्नान-ध्यान के बाद श्रद्धालुओं ने घाट किनारे विभिन्न मठो और मंदिरों में पुजा-अर्चना कर परिजनों के लिए ईश्वर से मंगलकामना की. सर्वमंगला के अधिष्ठाता स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने कहा माघ कृष्ण अमावस्या युगादि तिथि है. इसी दिन द्वापर युग का आरंभ हुआ था. इस दिन सनातनी हिंदू पवित्र नदियों में मौन रहकर स्नान करते हैं और तत्पश्चात पूजा-अर्चना, जप और दान करते हैं. इस दिन पितरों को तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं. उन्होंने कहा कि मौनी अमावस्या आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और भगवद् चिंतन का महापर्व है. इस दिन गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम में मौन रहकर स्नान करने से आध्यात्मिक विकास, मानसिक शांति और ऐहिक अभ्युदय होता है. स्नान के पश्चात इस दिन किया गया जप, तप और दान का अनंत गुना फल प्राप्त होता है. इस दिन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए,सदाचरण और संयमपूर्वक मौन रहकर आत्मविश्लेषण करें और परमात्मा का ध्यान करें. मौन रहना एक तप है, एक साधना है. सांसारिक जीवन में भी मौन के अनेक लाभ हैं. ””मौनेन कलहो नास्ति”” अर्थात् मौन से कलह नहीं होता. मौन से आपकी आंतरिक ऊर्जा का सरंक्षण होता है. आप अनावश्यक विवाद में नहीं पड़ते. ग्रंथों में मौन के अनेक गुण बताये गये हैं- जैसे परनिंदा से बचे व असत्य भाषण से बचेगे, अंतः काकरण की शांति भंग नहीं होगी, किसी से क्षमा नहीं मांगनी पड़ेगी. जब आप मौन रहते हैं, तब अपनी कमियों के विश्लेषण व परमात्मा के चितन,मनन का अवसर मिलता है.

इस दिन सूर्य व चंद्रमा एक साथ मकर राशि में रहते हैं

माघ मास की अमावस्या को मौनी अमावस्या कहा जाता है.इस दिन भुवन भास्कर सूर्य और चंदमा एक साथ मकर राशि में रहते हैं. वैसे तो प्रत्येक अमावस्या का स्नान,पूजा-पाठ,व्रत,जप,दान और साधना की दृष्टि से महत्व होता है,परंतु मौनी अमावस्या का साधना और मन की शुद्धि हेतु अतिशय महत्व शास्त्रों में वर्णित है.हमारा देश भारत आदि काल से ही धर्म और अध्यात्म-प्रधान देश रहा है. यहां पर ऐहिक अभ्युदय से पारलौकिक अभ्युदय को अधिक महत्व दिया गया है. इसी को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय मनीषा ने प्राचीन काल से ही अनेक पर्वो, अनुष्ठानों और साधना, उपासना के साथ प्रकृति पूजा,उसके संरक्षण व उससे जुड़ने का विधान किया है.

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