एमए, बीए से महंगी है क, ख, ग की पढ़ाई

Updated at : 04 Apr 2019 2:27 AM (IST)
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एमए, बीए से महंगी है क, ख, ग की पढ़ाई

बेगूसराय/बीहट : उदारीकरण के 25 वर्षों में निजी स्कूलों का तेजी से विस्तार हुआ है. हर शहर,कस्बे और ग्रामीण क्षेत्रों में भव्य इमारतें, स्मार्ट शिक्षक व सड़कों पर दौड़ती स्कूली बसें दिखायी देती है. अंग्रेजी माध्यम में अपने बच्चों को पढ़ाने की ललक और उनके बेहतर भविष्य के लिए कम आय वाले लोग भी निजी […]

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बेगूसराय/बीहट : उदारीकरण के 25 वर्षों में निजी स्कूलों का तेजी से विस्तार हुआ है. हर शहर,कस्बे और ग्रामीण क्षेत्रों में भव्य इमारतें, स्मार्ट शिक्षक व सड़कों पर दौड़ती स्कूली बसें दिखायी देती है.

अंग्रेजी माध्यम में अपने बच्चों को पढ़ाने की ललक और उनके बेहतर भविष्य के लिए कम आय वाले लोग भी निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं. यही वजह है कि ये स्कूल वार्षिक शुल्क, ड्रेस, किताब-कॉपी आदि के साथ-साथ अपने स्कूल की मासिक शुल्क थोड़ी ज्यादा रखते हैं.
ताकि अभिभावकों को अच्छा स्कूल होने का एहसास हो सके. सरकार की सुस्ती व लापरवाही के चलते जिले में निजी विद्यालय धड़ल्ले से फल-फूल रहे हैं. एक ओर सरकार समान शिक्षा प्रणाली का राग अलापती है तो दूसरी ओर शिक्षा में बाजारवाद की छूट दे रही है.
वार्षिक परीक्षाओं के बाद नये शैक्षणिक सत्र शुरू होने की आहट मात्र से अभिभावकों के माथे पर अभी से चिंता की लकीरें खींचने लगी है. एक बार फिर ऐसे स्कूलों की फीस मनमानी तरीके से बढ़ जायेगी. एडमिशन के समय मोटी राशि तो ली ही जाती है. नयी कक्षा में जाने पर एडमिशन फीस ली जायेगी.
इसके अलावा बच्चों में स्किल डेवलपमेंट के नाम पर सालों भर वसूली अलग से. शिक्षा के नाम पर किये जा रहे व्यापार पर अब प्रतिबंध लगाना जनता की मांग है.
क्या कहता है कानून
सीबीएसइ के नियमानुसार कोई भी सीबीएसइ से मान्यता प्राप्त स्कूल एक बार ही किसी बच्चे से नामांकन फीस ले सकता है. उससे फिर आगे के क्लास में जाने पर स्कूल दोबारा नामांकन शुल्क नहीं ले सकती है.
सीबीएसइ के अनुसार अगर कोई छात्र किसी क्लास में एक बार नामांकन ले लेता है, तो उसका दूसरे क्लास में खुद ही नामांकन हो जायेगा. लेकिन नियम को ताक पर रख कर अंग्रेजी भाषा का हौवा बनाती ऐसी स्कूलें मनमानी करने से बाज नहीं आ रहे हैं.
निजी स्कूल के शुल्क
रजिस्ट्रेशन : 300 रुपया
एडमिशन फी (एलकेजी से लेकर 10वीं) : 4000 रुपये
11वीं में एडमिशन : 6000 रुपये
ट्यूशन फी प्रतिमाह (एलकेजी से लेकर पांचवीं तक) : 1750 रुपये
छठी से लेकर 10वीं तक : 1920 रुपये
11वीं से 12वीं तक : 2400 रुपये
प्रतिमाह लिये जाने वाले अन्य चार्ज
कक्षा पहली से आठवीं तक : 60 रुपये
कंप्यूटर चार्ज
नवमी से 11वीं तक : 180 रुपये
12वीं के लिए : 120 रुपये
हर वर्ष लिये जाने वाले अन्य शुल्क
एलकेजी से आठवीं तक : 3690 रुपये
नवमी से 12वीं तक : 3940 रुपये
हर वर्ष डेवलपमेंट चार्ज
एलकेजी से 12वीं तक : 2400 रुपये
स्मार्ट क्लासेज के लिए 150 रुपये प्रतिमाह अलग से लिया जाता है.
सरकारी विद्यालय असुरारी बना है नजीर
महंगी फीस वाले स्कूल में कम आय वाले लोगों के बच्चे कैसे पढ़ सकेंगे, जहां शिक्षा की बजाय कमाने और आम लोगों को शिक्षा से दूर करने के लिए खोले जा रहे हैं. वहीं बरौनी प्रखंड का सरकारी उत्क्रमित उच्च विद्यालय असुरारी औरों के लिए नजीर पेश कर रहा है.
प्रधानाध्यापक अनिल कुमार राय के नेतृत्व में आज इंटर तक की पढ़ाई होती है और पूरे विद्यालय में करीब पंद्रह सौ बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे है. संसाधन और शिक्षकों की कमी के बावजूद न केवल अच्छी पढ़ाई होती है बल्कि अच्छा रिजल्ट भी होता है.
फीस पर नहीं है कोई कंट्रोल
निजी स्कूलों में ली जाने वाली फीस अभिभावक काफी मुश्किल से जमा कर पाते हैं लेकिन प्राइवेट स्कूल के संचालक किसी न किसी रूप में फीस बढ़ा ही देते हैं. बच्चे भले ही स्कूल के लैब व लाइब्रेरी का उपयोग न करें लेकिन उन्हें उनका शुल्क देना ही होता है.
दरअसल छुट्टी के पहले ही हर निजी स्कूल छात्रों से पूरे दो माह का ट्यूशन फीस अग्रिम में ही वसूल लेते हैं. विरोध करने पर स्कूल प्रबंधन सीधे बच्चे को हटा लेने की बात कह अभिभावक को चुप करा देते हैं.
अपने ही स्कूल में री-एडमिशन फीस
क्लास वन से टू में जाने की बात हो या क्लास थ्री से फोर में जाना हो, बिना री-एडमिशन के दूसरे क्लास में जाने की अनुमति अपने विद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों को भी नहीं है. कहीं पर री-एडमिशन,तो कहीं डेवलपमेंट के नाम पर मोटी रकम अभिभावकों से वसूली जाती है.
इतना ही नहीं सीबीएसइ से मान्यता प्राप्त अधिकांश स्कूलों में 10वीं बोर्ड पास करने के बाद 11वीं में अगर विद्यार्थी उसी स्कूल में पढ़ना चाहता है तो उन्हें दोबारा स्कूल द्वारा लिये जाने वाले टेस्ट परीक्षा में भी शामिल होना पड़ता है.
री-एडमिशन का बदला है नाम
कई छात्र संगठनों द्वारा जिले के निजी व पब्लिक स्कूलों की ओर से सालाना लिये जाने वाले री-एडमिशन के खिलाफ आंदोलन करने का असर अब तक कोई खास नहीं हुआ है.अलबत्ता इसका नाम जरूर बदल दिया गया है. री-एडमिशन की जगह अब ये स्कूल वार्षिक फी, विकास शुल्क व अन्य मदों के नाम पर अभिभावकों की जेब ढीली कर रहे हैं.
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