ePaper

हर रात मौत के साये में जी रहे हैं कई गांवों के िवस्थािपत परिवार

Updated at : 14 Aug 2018 3:59 AM (IST)
विज्ञापन
हर रात मौत के साये में जी रहे हैं कई गांवों के िवस्थािपत परिवार

इन लोगों को भी कभी थे आशियाने, लेकिन आज इनके पास कुछ भी नहीं है चमथा : आजादी के सात दशक बीत चुके हैं. लेकिन कई ऐसे गांव-बस्ती है, जहां आज भी विकास की रोशनी नहीं पहुंची है. कुछ ऐसी ही एक बानगी चमथा रिंग बांध पर बसे विस्थापित परिवारों की बस्ती में देखने को […]

विज्ञापन

इन लोगों को भी कभी थे आशियाने, लेकिन आज इनके पास कुछ भी नहीं है

चमथा : आजादी के सात दशक बीत चुके हैं. लेकिन कई ऐसे गांव-बस्ती है, जहां आज भी विकास की रोशनी नहीं पहुंची है. कुछ ऐसी ही एक बानगी चमथा रिंग बांध पर बसे विस्थापित परिवारों की बस्ती में देखने को मिल रही है. यहां हर रोज रात बीतने पर लोगों को नयी जिंदगी मिलती है. हर पल मानों जिंदगी को नयी सांसे मिलती है. जीवन जीने की जद्दोजहद देखना चाहते हैं तो बछवाड़ा प्रखंड क्षेत्र के चमथा तीन पंचायत अंतर्गत वार्ड संख्या एक व दो के नंबर रिंग बांध पर लगभग तीन से चार किलोमीटर लंबी दूरी में बसे बस्तियों को देखी जा सकती है. इस बांध पर हजारों इंसान रहते हैं, जिनकी जिंदगी की डोर ईश्वर की दया पर टिकी है.
जी हां ईश्वर की दया इसलिए कि पता नहीं कब जंगली जानवर घर से नवजात शिशु को उठा कर ले जाये या कब सर्प लोगों को डस कर उनकी जीवन लीला ही समाप्त कर दें. इस तरह यहां लोग पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को विवश हैं. इन लोगों को कभी अपने आशियाने भी हुआ करते थे. आज इनके पास कुछ भी नहीं है. नंबर रिंग बांध पर दशकों पूर्व पटना जिले के पंडारक थाना क्षेत्र के रैली दियारा के गंगा नदी में वर्ष उन्नीस सौ नब्बे में आये विनाशकारी बाढ़ व कटाव से इन हजारों लोगों के घर,खेत-खिलहान गंगा में कट कर विलीन हो गये. तब से आज तक इस स्थानों पर हजारों लोग झुग्गी झोंपड़ी में विस्थापन के जीवन जीने को विवश हैं. विस्थापितों की समस्या को लेकर कुछ राजनीतिक दल के तात्कालिक नेताओं ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था. परंतु वर्ष 1997 के बाद यह मुद्दा भी ठंडे बस्ते में पड़ गया. दशकों पूर्व से इन स्थानों पर तमाम संकटों को झेलते हुए गुजर-बसर कर रहे हजारों परिवारों की सुधि ना तो जिला प्रशासन और ना ही जनप्रतिनिधि ही ले सके हैं. आज तक इनके पुनर्वास की समुचित व्यवस्था तक नहीं की जा सकी है. स्थानीय लोगों ने वर्षों से दिल में दबाये दर्द बयां करते हुए कहा कि एक तो ईश्वर व प्रकृति की मार वर्षों से झेलने को विवश हूं. ऊपर से सरकारी मुलाजिम के द्वारा झुग्गी झोंपड़ी हटाने व बांध खाली करने का फरमान जीवन जीने पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है. पीड़ित उपेंद्र सिंह, वीरेंद्र सिंह, प्रशांत कुमार, मंगल सिंह, अशर्फी सिंह आदि ने बताया कि यहां हजारों परिवार सिर्फ ईश्वर के सहारे ही अपना जीवन यापन करते हैं.
क्या कहते हैं मुखिया
दशकों से विस्थापन की जीवन जीने को लोग विवश है. इनकी ओर देखने वाला कोई नहीं है. यहां हजारों परिवार लगभग तीन दशक से जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे हैं. प्रशासन व जनप्रतिनिधि इस गंभीर समस्या पर ध्यान देकर सुरक्षित स्थानों पर जमीन मुहैया करा सभी विस्थापित को अविलंब बसाने की मांग करती हूं.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन