उजाले अपनी यादों के...” : बांका में ताजा हुईं बशीर बद्र की यादें, कवियों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

Published by : VINOD RAO Updated At : 29 May 2026 5:48 PM

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बशीर बद्र की शायरी आम लोगों की भाषा और भावनाओं से जुड़ी रही, यही कारण है कि वे हर पीढ़ी के बीच लोकप्रिय रहे.साहित्यप्रेमियों मे उदयेश रवि, मनोज मिश्रा सहित अन्य ने कहा कि बशीर बद्र की गजलें और नज्में आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी.

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बौसी : मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र के निधन की खबर से बांका का साहित्यिक जगत भी गमगीन है. शहर के कवियों और साहित्यकारों ने उन्हें याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. उनके साथ बिताये संस्मरण साझा करते हुए साहित्यकारों ने कहा कि बशीर बद्र अपनी शायरी के साथ-साथ सहज और आत्मीय व्यवहार के लिए भी हमेशा याद किये जायेंगे.

कवि शंकर दास ने बताया कि उनकी बशीर बद्र साहब से जुड़ी दो खास यादें हैं. पहली मुलाकात खगड़िया के मुशायरे में वर्ष 1987-88 में हुई थी, जहां उन्हें बशीर बद्र के साथ काव्य पाठ का अवसर मिला था. दूसरी बार बांका में आयोजित कुल हिंद मुशायरा में उनसे मुलाकात हुई. उस दौरान भागलपुर से बांका की यात्रा में वे उनके सहयात्री भी रहे. उन्होंने कहा कि सफर के दौरान बशीर बद्र से काफी बातें हुई थीं, जो आज भी स्मृतियों में ताजा हैं.

बशीर बद्र की मशहूर नज्म की पंक्तियां याद करते हुए कहा—

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए.कवि शंकर दास ने भावुक होकर कहा कि शाम को होना ही था, लो हो भी गयी और उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की.वहीं साहित्यकार डॉ. अचल भारती ने बताया कि इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक में उनके एवं तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक ध्रुव जी के संयुक्त प्रयास से जिला पुलिस प्रशासन के आयोजकत्व में बांका समाहरणालय परिसर में कवि सम्मेलन सह मुशायरा का आयोजन कराया गया था. उस कार्यक्रम में बशीर बद्र की उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया था. उन्होंने कहा कि बशीर बद्र की शायरी आम लोगों की भाषा और भावनाओं से जुड़ी रही, यही कारण है कि वे हर पीढ़ी के बीच लोकप्रिय रहे.साहित्यप्रेमियों मे उदयेश रवि, मनोज मिश्रा सहित अन्य ने कहा कि बशीर बद्र की गजलें और नज्में आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी. उनके निधन को साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति बताया गया.

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