सावन में क्यों उमड़ती है मंदारनाथ महादेव में श्रद्धालुओं की भीड़, जानिए इस प्राचीन शिवधाम का रहस्य

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फोटो कैप्शन :मंदार पर्वत मध्य में स्थित मंदार नाथ महादेव मंदिर और जल रहा अखंड दीप | Prabhat Khabar Network

फोटो कैप्शन :मंदार पर्वत मध्य में स्थित मंदार नाथ महादेव मंदिर और जल रहा अखंड दीप | Prabhat Khabar Network

बिहार के बांका जिले का मंदार पर्वत सिर्फ समुद्र मंथन की कथाओं तक ही सीमित नहीं है. यह भगवान शिव का दिव्य निवास, भगवान विश्वकर्मा की अद्भुत शिल्पकला और राजा दिवोदास की अनन्य भक्ति का प्रतीक है. मंदारनाथ महादेव मंदिर की अद्भूत कथा और सावन में यहां उमड़ने वाली भीड़ का रहस्य जानें.

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Banka News: बिहार के बांका जिले का विश्वविख्यात मंदार पर्वत केवल समुद्र मंथन की पौराणिक स्मृतियों तक सीमित नहीं है. यह भगवान शिव के दिव्य निवास, देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा की अद्भुत शिल्पकला और काशी नरेश राजा दिवोदास की अनन्य भक्ति का भी जीवंत प्रतीक माना जाता है. पर्वत के मध्य स्थित प्राचीन मंदारनाथ महादेव मंदिर को लेकर मान्यता है कि इसका निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने राजा दिवोदास के निर्देश पर कराया था. मंदिर परिसर में आज भी जल रही अखंड ज्योति श्रद्धालुओं के लिए अटूट आस्था और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है.

सावन के पवित्र महीने में इस शिवधाम का महत्व और बढ़ जाता है. बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए यहां पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदारनाथ महादेव में सच्चे मन से की गई प्रार्थना भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती है.

समुद्र मंथन की भूमि से जुड़ा शिवधाम

मंदार पर्वत को पौराणिक परंपराओं में समुद्र मंथन की स्थली के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है.

इसी पर्वत के मध्य स्थित मंदारनाथ महादेव मंदिर को भगवान शिव के दिव्य निवास के रूप में भी प्रतिष्ठा मिली है. शिव पुराण सहित कई धार्मिक परंपराओं में इस स्थान का उल्लेख मिलता है, जिसके कारण यह मंदिर प्राचीन काल से ही श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है.

माता पार्वती की इच्छा पर बना था दिव्य महल

पौराणिक कथा के अनुसार, विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती के साथ मंदार पर्वत पहुंचे थे.

उस समय यहां उनके निवास की व्यवस्था नहीं थी. माता पार्वती की इच्छा पर भगवान शिव ने देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा को भव्य महल निर्माण का आदेश दिया. मान्यता है कि विश्वकर्मा ने 64 योजन क्षेत्र में स्वर्णिम महल का निर्माण किया, जिसकी दीवारें सोने से निर्मित और शुभ प्रतीकों से अलंकृत थीं. यही दिव्य स्थान कालांतर में मंदारनाथ महादेव धाम के रूप में प्रतिष्ठित हुआ.

राजा दिवोदास की भक्ति से जुड़ी है मंदिर की परंपरा

मंदार पर्वत का संबंध काशी के राजा दिवोदास से भी जोड़ा जाता है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, राज्य की विपन्नता दूर करने और भगवान गणेश को काशी लाने की कामना लेकर दिवोदास मंदार पहुंचे थे. भगवान गणेश ने उन्हें बताया कि जब तक भगवान शिव काशी नहीं जाएंगे, वे भी वहां नहीं जाएंगे. इसके बाद राजा दिवोदास ने भगवान शिव की कठोर आराधना की और उनके स्थायी निवास के लिए मंदिर निर्माण का संकल्प लिया. परंपरा के अनुसार, इसी संकल्प को मूर्त रूप देते हुए भगवान विश्वकर्मा ने मंदारनाथ महादेव मंदिर का निर्माण किया.

इतिहासकारों की नजर में मंदार का महत्व

इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार, मंदार पर्वत का महत्व केवल समुद्र मंथन तक सीमित नहीं है.

शिव पुराण में इसे भगवान शिव के दिव्य निवास के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है. यही कारण है कि सावन, महाशिवरात्रि और अन्य प्रमुख पर्वों पर यहां जलाभिषेक और रुद्राभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.

अखंड दीप और संत परंपरा ने जीवित रखी विरासत

मंदारनाथ महादेव मंदिर की आध्यात्मिक परंपरा भी अत्यंत समृद्ध मानी जाती है.

बौंसी के प्रथम चिकित्सक डॉ. चंद्रशेखर खवाड़े ने वर्ष 1914 से 1961 तक नियमित रूप से मंदिर का रंग-रोगन कराया. बिहारी लाल चट्टोपाध्याय ने यहां अखंड दीप की परंपरा प्रारंभ कराई. रवींद्रनाथ ठाकुर की भतीजी और ठाकुर विजय कृष्ण की शिष्या सरला देवी भी इस मंदिर की अनन्य भक्त मानी जाती हैं. बाद के वर्षों में सबलपुर के जमींदार मंदारेश्वर सिंह, बौंसी के श्याम पाठक, गुरिया के गौरांग झा, नगरी के दिवाकांत झा और भागलपुर के द्वारिका सिंह ने भी मंदिर की परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

Banka News: आज भी जल रही है आस्था की अखंड ज्योति

मंदिर परिसर में आज भी अखंड ज्योति निरंतर प्रज्ज्वलित है, जिसे श्रद्धालु भगवान शिव की अनंत कृपा का प्रतीक मानते हैं.

हिंदू और जैन दोनों परंपराओं में पूजनीय मंदार पर्वत अपनी पौराणिक महिमा, ऐतिहासिक विरासत और आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थों में विशिष्ट स्थान रखता है. सावन के अवसर पर यहां उमड़ने वाली श्रद्धा की अविरल धारा मंदार को बिहार ही नहीं, पूरे देश की आध्यात्मिक पहचान के रूप में स्थापित करती है.

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संजीव कुमार

लेखक के बारे में

By संजीव कुमार

संजीव कुमार पाठक प्रिंट माध्यम में 18 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. बौंसी (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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