कोहरे के बीच कॉलेज जाती लड़कियां रिक्शा पर सवारी ले जाता रिक्शा चालक.

Published at :13 Dec 2016 4:11 AM (IST)
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कोहरे के बीच कॉलेज जाती लड़कियां रिक्शा पर सवारी ले जाता रिक्शा चालक.

कड़ाके की ठंड, कोहरा व बर्फीली हवा ने लोगों को घरों में दुबकने को मजबूर कर दिया है. ऐसे में जिला प्रशासन द्वारा अलाव की व्यवस्था नहीं किया जाना लोगों की समझ से परे है. बांका : हाड़ कंपाने वाली ठंड व कोहरे के कारण जिला वासी ठिठुर रहे हैं. लोग घरों में दुबके रहते […]

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कड़ाके की ठंड, कोहरा व बर्फीली हवा ने लोगों को घरों में दुबकने को मजबूर कर दिया है. ऐसे में जिला प्रशासन द्वारा अलाव की व्यवस्था नहीं किया जाना लोगों की समझ से परे है.

बांका : हाड़ कंपाने वाली ठंड व कोहरे के कारण जिला वासी ठिठुर रहे हैं. लोग घरों में दुबके रहते हैं. ऐसे में बस पड़ाव, रेलवे स्टेशन व रिक्शा चालकों के लिए मानो आफत आ गयी है. इस स्थिति में
भी जिला प्रशासन के द्वारा कहीं भी अलाव की व्यवस्था नहीं की गयी है. शायद वो इंतजार कर रहा है कि किसी गरीब की मौत ठंड से हो तब जाकर अलाव की व्यवस्था की जायेगी. सोमवार को न्यूनतम पारा 13 डिग्री एवं अधिकतम 21 डिग्री दर्ज किया गया. रविवार की अपेक्षा सोमवार को सुबह दस बजे के बजाय एक बजे दोपहर में निकला.
ठंड की मार अधिकतर गरीब परिवारों पर पड़ती है. उन्हें ही आस लगा रहता है कि कब जिला प्रशासन द्वारा अलाव की व्यवस्था की जायेगी. और कब उनकी रात आराम से कटेगी. जब ठंड आता है तब गरीबों के रहने के लिए जिला प्रशासन रैन बसेरा की खोज करती है. लेकिन बांका को जिला बने करीब 25 वर्ष हो चुके है. लेकिन गरीबों या जुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले की रात आराम से गुजराने के लिए जिला में मात्र एक ही रैन बसेरा है. उसमें भी विभागीय कार्यालय चल रहा है. कभी भी रैन बसेरा में एक दिन के लिए भी ठंड के दिनों में गरीब नहीं ठहरे है. रैन बसेरा में पहले जिला परिषद कार्यालय चलता था. अब जब जिला पार्षद कार्यालय स्थानांतरित होकर अपने भवन में चला गया तो उस रैन बसेरा में जिला नियोजनालय का कार्यालय संचालित होने लगा. सिर्फ नाम का है रैन बसेरा लेकिन वहां सिर्फ बसेरा विभागीय कार्यालय के कर्मियों का है गरीबों का नहीं.
बांका जंक्शन के विश्रामगृह में आरपीएफ का कबजा
बीते चार दिनों से लगातार पारा गीरने के बाद भी यात्रियों की सुविधा के लिए अलाव की व्यवस्था नहीं होने से यात्री ठंड से परेशान है. बांका रेलवे स्टेशन की बात करें तो यहां पर यात्रियों के बैठने के लिए प्लेटफार्म एक एवं दो पर देा दो सेड है लेकिन सेड के नीचे बैठने पर यात्री ठंड से परेशान हो रहे है. वहीं एक नंबर प्लेटफार्म पर ही यात्री विश्रामगृह का निर्माण हुआ है. जहां पर यात्री ठंड से बचने के लिए बैठ सकते है लेकिन वहां आरपीएफ का कब्जा है. जिससे यात्री रेल पुलिस को देखकर ही उसमें बैठने से परहेज करते है. इस संबंध में आरपीएफ जवान ने बताया कि तीन-चार दिन पूर्व ही वो भागलपुर से बांका आये है उनके ठहरने के लिए कोई जगह नही रहने पर ही स्टेशन मास्टर के द्वारा यात्री विश्राम गृह में ठहरने को कहा गया है. जो यात्री ट्रेन पकड़ने के लिए आते है उन्हें यात्री विश्राम गृह में बैठने से नहीं रोका जाता है. जब तक कोई व्यक्लपिक व्यवस्था ठंड से बचने के लिए नहीं हो जाता तब तक यात्री विश्राम गृह में ही मजबूरीबश ठहरना पड़ रहा है.
सदर अस्पताल में है ठंड की पर्याप्त व्यस्था
सदर अस्पताल बांका में भर्ती मरिजों के ठहरने पर अस्पताल प्रशासन ने पूरी व्यवस्था कर ली है. जो मरीज भर्ती हो जाते है उन्हें ओड़ने के लिए कंबल दिया जा रहा है. जो मरीज अस्पताल द्वारा मुहैया कंबल नहीं लेते है वह अपने साथ घर से लाये कंबल का उपयोग करते है. सोमवार को इमरजेंसी वार्ड में भेलाय जोगडीहा की उषा देवी एवं पपरेवा बौंसी के मोती दास भर्ति थे. उन्होंने बताया कि भर्ति होने के बाद अस्पताल प्रशासन द्वारा ओढ़ने के लिए कंबल दिया गया है.
जिले को मिला अलाव का आवंटन
शीतलहर के दौरान जिले भर में अलाव की व्यवस्था के लिए सोमवार को राज्य आपदा विभाग से जिला आपदा विभाग को 50 हजार रुपये का आवंटन प्राप्त हुआ है. लेकिन 50 हजार रुपये से जिले के सभी 11 प्रखंउों में अलाव की व्यवस्था हो पाना असंभव प्रतित हो रहा है. शायद अलाव की सिर्फ खानापूर्ति कर जिला प्रशासन इससे अपना पीछा छोड़ा रहा है. लेकिन अधिकारियों की माने तो अभी पूरे जिले में अलाव नहीं जलेगा क्योंकि अभी शीतलहर नहीं आयी है.
बस पड़ाव पर ठिठुरते दिखे यात्री
शहर के कटोरिया रोड स्थित बस पडाव से सुबह चार बजे से लेकर शाम के साढ़े छह बजे तक यात्रि बसे विभिन्न स्थानों के लिए खुलती है. लेकिन ठंड को देखते हुए यात्रियों की सुविधा के लिए ना तो जिला प्रशासन ने ठंड से बचाव का कुछ उपाय किया है और ना ही बस पडाव का ठेका लेने वाले संवेदक, जिससे यात्री ठंड में ठिठुरते हुए देखे जा रहे है. बस पडाव पर यात्रियों के बैठने के लिए नवनिर्मित भवन लगभग बन कर तैयार है. लेकिन भवन का उद‍्घाटन नहीं होने से उसमें बने यात्री विश्रामस्थल का उपयोग यात्री नहीं कर पा रहे है. मजबूरी बस यात्री बस पडाव के खुले में बैठकर बस का इंतजार करते है. शाम के पांच बजे से साढ़े छह बजे तक तीन बसे लंबी दूरी के लिए खुलती है जिनमें दो बस जसीडीह के लिए एवं एक बस रांची के लिए खुलती है. दिन में पारा तो कुछ ठीक भी रहता है लेकिन शाम होते होते पारा के अत्यधीक नीचे आ जाने से दूर-दराज से बस पकड़ने आये यात्रियों को ठंड से बचाव का कोई उपाय बस पडाव पर नहीं मिलता है.
शाम होते ही ठहर जाता है शहर
ठंड का प्रकोप लगातार बढ़ते चले जाने से शाम सात बजे के बाद ऐसा लगता है जैसे शहर ठहर गया हो. शाम ढलने के पूर्व ही लोग जरूरी काम निबटा कर घर को चले जाते है. जिससे शहर में लोगों की आवाजाही रात्रि के आठ बजे तक लगभग पूर्णत: शांत हो जाता है. जिससे दुकानदार भी अपने दुकानों को बंद कर घर की ओर निकल जा रहे है. ठँड की वजह से जब शहर की स्थिति यह है तो गांव के बाजार या प्रखंडों की क्या स्थिति होगी. इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.
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