144 वर्ष पुराना है समुखिया काली का इतिहास

Published at :01 Nov 2015 9:43 PM (IST)
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144 वर्ष पुराना है समुखिया काली का इतिहास

बांका : जिला मुख्यालय से महज कुछ किलो मीटर दूरी पर स्थित समुखिया गांव में स्थापित मां काली का इतिहास काफी पुराना है. मुखिया रविंद्र मोहन मिश्र ने बताया इस स्थान पर उनके पूर्वज ही पूजा करते थे. मुखिया श्री मिश्र ने बताया कि इस मंदिर में 1872 से पूजा होती है. उन्होंने बताया कि […]

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बांका : जिला मुख्यालय से महज कुछ किलो मीटर दूरी पर स्थित समुखिया गांव में स्थापित मां काली का इतिहास काफी पुराना है. मुखिया रविंद्र मोहन मिश्र ने बताया इस स्थान पर उनके पूर्वज ही पूजा करते थे. मुखिया श्री मिश्र ने बताया कि इस मंदिर में 1872 से पूजा होती है. उन्होंने बताया कि वे लोग भलुनी (आरा)के रहने वाले थे.

एक दिन साह आलम द्वितीय जब शिकार करने जा रहे थे तो उनके पूर्वज से राजा ने पूछा कि आज वह किसका शिकार करेंगे. जिस पर उनके पूर्वज ने कहा कि आपको पानी में दो तितर मिलेगा. जिस पर राजा ने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो पूरे परिवार को कोल्हू में पिसवा दिया जायेगा. जिसके बाद उनके पूर्वज गौतम पांडेय ने मां काली के आराधना की.

राजा को शिकार के दौरान तितर ही मिला. जिसके बाद राजा ने उनको यहां का राज्य दिये. उनके पूर्वज के तौर पर यहां पर चेत नारायण राय पहुंचे. वह मात्र सात वर्ष के थे. उनका देख रेख उनकी फुआ करती थी. उसी दौरान 1871 में अंग्रेजों के द्वारा पूराने दस्तावेज को बदल कर नया दस्तावेज दे रहे थे. लेकिन चेत नारायण राय की फुंआ ने मना कर दिया.

उसी दौरान उनकी फुंआ ने कहा कि अगर उनकी जमींदारी बची रही तो यहां पर मां काली की मूर्ति पूजा की जायेगी. फिर उनको दस्तावेज मिल गया. तब से लेकर लगातार चेत नारायण राय के द्वारा यहां पर पूजा अर्चना की जाने लगा. यहां पर पूजा पुरोहित के द्वारा होता था. भव्य मेला का भी आयोजन होता था.

उनके निधन के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र सूर्य नारायण राय ने यहां पर पूजा आरंभ की. यहां पर संथाली नृत्य भी होता था. इनके बाद इनके ज्येष्ठ पुत्र अंबिका प्रसाद मिश्र ने पूजा अर्चना आरंभ की. और उन्होंने घोषणा की कि अब इस मंदिर में वह खुद से पूजा आरंभ करेंगे. उसके बाद से वह तांत्रिक विधि विधान से पूजा आरंभ किये. जो आज तक जारी है.

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