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50 Years of Emergency: आपातकाल के 50 वर्ष पूरे, बांका में भी धधकी थी क्रांति की मशाल, क्रांतिकारियों ने पेड़ पर काटी थी रात

Updated at : 24 Jun 2025 8:50 PM (IST)
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50 Years of Emergency: आपातकाल के 50 वर्ष पूरे, बांका में भी धधकी थी क्रांति की मशाल, क्रांतिकारियों ने पेड़ पर काटी थी रात

50 Years of Emergency: आपातकाल के 50 वर्ष पूरे हो गये हैं. आज भी जेपी आंदोलन के क्रांतिकारी सभी जगह मौजूद हैं. उन पलों को याद करते भावुकता से भर जाते हैं. पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि उस दौरान भूखे-प्यासे पेड़ पर रात गुजारनी पड़ी थी. पुलिस घर की कुर्की जब्ती कर लेते थे. चौखट-किवाड़ सब उखाड़ ले जाते थे. स्थिति इतनी विकट थी कि अपने भी परहेज करने लगे थे.

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50 Years of Emergency, प्रभात खास, बिभांशु, बांका: 25 जून की मध्य रात्रि आपातकाल की घोषणा हुई थी. दूसरे दिन 26 जून 1975 को बांका का माहौल अन्य दिनों की भांति ही सामान्य था. जिले की मौजूदा आबादी को आपातकाल का सही मायने में क्या असर होता है, उसका अंदाजा नहीं था. क्रांतिकारी भी बेखबर थे कि उनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है. संचार का माध्यम सीमित था. पुलिस सख्त हुई व उसकी हनक सड़कों पर दिखनी शुरु हुई. तब इसके असल मायने समझ में आए. उसके बाद तो जेपी मूवमेंट का बुलेटिन आपातकाल के वास्तविक अर्थों से क्रांतिकारियों को अवगत करा दिया. छात्र आंदोलन से ही यहां क्रांति की मशाल जल रही थी, आपातकाल में यह ज्वाला के रूप में धधक पड़ी. आंदोलन चरम पर पहुंचा.

जेपी सेनानियों के लिए हुई पेंशन की व्यवस्था

2005 में एनडीए की सरकार ने जेपी मूवमेंट में जेल जाने वाले क्रांतिकारियों को सम्मानित करने की योजना बनायी. जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना की शुरुआत वर्ष 2009 में की गयी. शुरुआती समय में जिले के तीन दर्जन सेनानियों को पेंशन की श्रेणी में लाया गया. इसके लिए जेल में बिताये गये अवधि को मापदंड बनाया गया. इस आंदोलन में बड़ी संख्या में क्रांतिकारी न केवल गिरफ्तार हुए व जेल गये बल्कि बाहर रखकर गुप-चुप तरीके से भी आंदोलन को जिंदा रखने में बड़ी भूमिका निभायाी.

इस दौरान उन्होंने कई यातनाएं भी झेली. जानकारी के अनुसार परमानंद प्रसाद सिंह, राजेंद्र प्रसाद चैधरी, हरेकृष्ण पांडेय, जयनारायण पांडेय, रामचरण राव, केदार सिंह उर्फ परमेश्वर, भोला साव, सत्यनारायण चौधरी, भास्करनंद अवधुन, गणेश सिंह, विवेकानंद सिंह, ललन कुमार सिंह, नवल किशोर चौधरी, अभिमन्यु सिंह, दशरथ प्रसाद सिंह, अमरेंद्र कुमार राजहंस, नरेश पासवान, विजय प्रसाद सिंह उर्फ ज्ञानानंद, अजब लाल हरिजन, इंद्रदेव सिंह, महेश शर्मा, गुलाम मुस्तका खां, कृष्णदेव सिंह, विभाष चंद्र पाठक, वराती हरिजन, कांता सिंह उर्फ कांति सिंह, श्रवण कुमार कनोडिया की आश्रित पूनम देवी, विपिन कुमार सिंह, गुलाब भगत, गणेश प्रसाद सिंह, बाबू लाल सिंह, उगेंद्र प्रसाद मंडल, त्रिभुवन नारायण आदि को आरंभ में पेंशन की सूची में रखा गया. इसके बाद भी कई सेनानियों के पेंशन की सूची में शामिल किया गया था. आज भी बड़ी संख्या में संपूर्ण क्रांति के सदस्य इसकी मांग में जुटे हुए हैं. दिवाकर झा शास्त्री जैसे कई युवा नेता उस दौरान आंदोलन में सक्रिय रहे थे. उनका कहना है कि आंदोलन में अपनी भागीदारी निभाने वाले को सरकार सम्मान दे.

इन जेलों में रखा गया था क्रांतिकारियों

गिरफ्तारी के बाद क्रांतिकारियों को बांका सब जेल में अल्प अवधि तक रखने के बाद विशेष केंद्रीय कारा भागलपुर और शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा भागलपुर में स्थानांतरित कर दिया जाता था.

आपातकाल के दौरान कर्पूरी का भितिया में अज्ञातवास

आपातकाल का समय चल रहा था. अचानक जननायक कर्पूरी ठाकुर जिले के फुल्लीडुमर प्रखंड अंतर्गत भितिया निवासी सह क्रांतिकारी कृष्णदेव सिंह के पैतृक घर पर साधु के वेश में पहुंच गये थे. इसके बाद उन्हें सिंह ने अपने बासा नाढ़ातरी व पुतरिया गांव के वैद्य चुनचुन ठाकुर के यहां भूमिगत रखा. कई दिनों तक इस इलाके के जंगल में प्रवास करने के बाद दोनों लहावन स्टेशन पर ट्रेन पकड़ कर कोलकाता पहुंच गये थे.

जेपी सेनानी की जुबानी

हल्दी का टीका लगाकर मां ने किया था विदा : कृष्णदेव

25 जून को इमरजेंसी की घोषणा रात में हुई. इसकी खबर रेडियो के माध्यम से मिली थी. वह अपने ननिहार अमरपुर के मंझगांव में थे, 26 जून को तुरंत बांका पहुंचे. थाना गेट के पास जनार्दन यादव को डीएसपी अपनी गाड़ी पर ले गये. कचहरी के पास कई क्रांतिकारी जमा थे. काफी मुसीबत भरा समय रहा. आपाताकाल में सक्रिय रहने के दौरान अक्सर उनके नाम से पार्टी नेता बुलेटिन भेजा करते थे ताकि इस आंदोलन को जिंदा रखा जाय.

कार्यकर्ताओं को विचारों व कार्यक्रमों से अवगत कराया जाय. इसी बुलेटिन के आधार पर दुर्गा पूजा के समय एसडीओ एच खां, डीएसपी सुबोध राय और दारोगा रामराज सिंह उनकी गिरफ्तारी के लिए घर पर पहुंचे थे. उनकी माता ने भरे हृदय से दही और हल्दी का टीका लगाकर जेल के लिए उन्हें विदा किया था. वह दौर काफी संक्रमण भरा था. उनकी माता इस दृश्य से काफी क्षुब्ध हो गयी थी.

डीएसपी ने किया गिरफ्तार: जनार्दन

जयप्रकाश आंदोलन में उन्होंने जनसंघ की ओर से लड़ाई लड़ी थी. 1972 में वह अमरपुर में विधायक निर्वाचित हुए थे. इस सरकार के विरोध में उन्होंने अपनी विधायिका से इस्तीफा दे दिया था. आपाताकाल की घोषणा के दूसरे दिन ही थाना के पास डीएसपी ने उन्हें गाड़ी में बैठा लिया और कहा कि चलिये जरा बाजार का जायजा लेते हैं. बाजार घूमने के बहाने उन्होंने उनकी गिरफ्तारी कर थाना पहुंचा दिया. यहां से सब जेल बांका में एक-दो दिन रखा और उसके बाद भागलपुर कैंप जेल भेज दिया. भ्रष्ट्राचार के खिलाफ यह आंदोलन था.

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आपातकाल में खाने के लाले थे: उगेंद्र

जेपी सेनानी उगेंद्र मडल ने कहा कि 25 जून की रात के इमरजेंसी घोषणा हुई थी. 26 जून को सुबह ही आम लोग जान पाये. सभी आंदोलनकारी भूमिगत होने लगे. उस दौरान सबसे बड़ी समस्या एक-दूसरे साथी से संपर्क साधने की थी. चांदन नदी पार कर नहर रास्ते वे 27 जून को भागलपुर के गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचे. उस समय वहां जय प्रकाश जय, अशोक घोष, ललन सर्राफ, गुप्ता बाबू जैसे साथियों से मुलाकात हुई.

पार्टी का निर्देश हुआ कि दीवार लेखन के माध्यम से आंदोलन को धारधार बनाया जाय. दो दिन के अंदर ही भागलपुर के गुप्त स्थान से एक बुलेटिन तरूण क्रांति निकलना शुरु हो गया. बाद में एक और बुलेटिन लोकवाणी भी आने लगी, जिससे राज्य और देश की स्थिति बारे जानकारी होने लगी. स्थिति इतनी विकट हो गयी थी कि खाने के भी लाले पड़ गये थे. देवदा के एक चाय दुकानदार ने चाय पिलाया और बिस्किट खिलाया था. दीवार लेखन में उपेन्द्र चैधरी ने मदद किया था.

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बबुल टुसा खाकर गुजारा था दिन: कांता सिंह

जेपी सेनानी सह प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष कांता प्रसाद सिंह ने कहा कि वह छात्र आंदोलन से ही सक्रिय थे. इमरजेंसी के बाद केदार सिंह ने उन्हें घर आकर इसकी जानकारी दी थी. काफी विकट परिस्थिति बन गयी थी. वह जनसंघ मंडल कमिटि के मंत्री थे. आपातकाल लागू होने के दूसरे दिन मुड़हारा स्थिति उनके घर को पुलिस ने घेर लिया था. वह घर से निकलर जेठौर की तरफ चल दिये. उस समय घर में 10 मिनट भी रहना मुश्किल था. गुप्चतर काफी एक्टिव था. सगे-संबंधियों ने भी परहेज कर लिया था. कहीं ठिकाना नहीं था.

एक वक्त ऐसा आया कि पेड़ पर दिन-रात काटनी पड़ी. तीन तीन तक भूखे रहे और इस दौरान बबलू का टूसा खाकर पानी पिया था. तीन दिन के बाद एक अमरुद खाने को नसीब हुआ था. पुलिस ने उनके घर की कुर्की जब्ती कर ली थी. घर का चौखट-किवाड़ तक उखाड़ ले गये थे. तंग आकर उन्होंने वकालत खाना पास एक काला झंडा लेकर इंदिरा गांधी के खिलाफ नारा लगाया ”इंदिरा तेरी तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी” इसके बाद पार्टी के निर्देश पर उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दे दी थी.

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

By Paritosh Shahi

परितोष शाही डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की. अभी प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम में काम कर रहे हैं. देश और राज्य की राजनीति, सिनेमा और खेल (क्रिकेट) में रुचि रखते हैं.

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