एक पिंड पर दो महावीर जगा रहे आस्था

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बांकाः यूं तो मंदार और इसके आस-पास के इलाके की भूमि अध्यात्म और पुरातत्व धरोहरों का गढ़ माना जाता है. यहां की भूमि धर्म आस्था और सद्भाव के अनेकों स्वर्णिम इतिहास के किस्से को अपने दिल में छुपा रखी है. अंग प्रदेश की इस भूमि में अनेकों ऐसे रहस्य है जिसे जानने एवं सुनने के […]

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बांकाः यूं तो मंदार और इसके आस-पास के इलाके की भूमि अध्यात्म और पुरातत्व धरोहरों का गढ़ माना जाता है. यहां की भूमि धर्म आस्था और सद्भाव के अनेकों स्वर्णिम इतिहास के किस्से को अपने दिल में छुपा रखी है. अंग प्रदेश की इस भूमि में अनेकों ऐसे रहस्य है जिसे जानने एवं सुनने के बाद आपके मन मस्तिष्क में इसकी सकारात्मक छाप बन जायेगी.

सुनहरे अतीत के पन्नों को उलटने पर शहीद सतीश का गांव बाराहाट के खड़हरा में भी एक गौरवशाली इतिहास की किवदंती कहानी जानने की दिलचस्पी आप के मन मंदिर में घर कर जायेगी. इसके पुराण ओर शौर्य के किस्से से परदा भी अब उठने लगा है, तो अंग जनपद के प्रताप की कहानी बयां कर रहा है.

गांव के मध्य स्थित काली मंदिर के समीप संगमरमर की बनी पूजन स्थल है, जिसके पिंड आज भी खुले आसमान के नीचे हैं. राजीव पाठक बताते हैं. इस पिंड पर ग्राम देवता के रूप में पूजे जाने वाले तिवारी बाबा है. उनके ठीक बगल में तीर्थंकर भगवान महावीर के रूप वाले देवता हैं. ठीक उनके बगल में लक्ष्मी एवं इसके अंतिम में हिंदू के देवता राम भक्त भगवान महावीर हैं, जिन्हें पूजने आने वाले लोग एक साथ ही सभी की पूजा आजे के दिन करते हैं. तिवारी बाबा के बारे में बताया कि सावन से पहले गांव के लोगों द्वारा भव्य पूजा की जाती हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि किसी भी तरह के सर्प के काटने के बाद यहां के कभी न सूखने वाले नीर के सेवन व स्नान से आदमी को जिंदगी की अमृत मिल जाती है.

वहीं गांव के काशीनाथ चौधरी ने कहा कि इन सभी प्रतिमाओं की स्थापना कब हुई कोई नहीं जानता. यहां पिंड पर मूर्ति खुद ये अवतरित हुई बतायी जाती है. बड़े-बड़े कान वाले, कान में कुंडल, सिंहासन और मुकुट वाली मूर्ति को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि पुरातत्व विभाग के अनुसार ये मूर्ति पाल काल के हैं. लालमणी चौधरी कहते हैं कि मूर्ति का सिर वाला हिस्सा भगवान महावीर के समान है. इनके पिंड पर ही राम भक्त महावीर की भी जगत जानने वाली मूर्ति की पूजा की जाती है. आज रामनवमी को यहां धूम धाम से ध्वजा लगायी जायेगी.

वर्तमान पंडा के अनुसार मूर्ति की पूजा सबसे पहले अशर्फी यादव ने की थी. कई पीढ़ी से यादव कुल के द्वारा पूजा यहां की जाती है. यह पूजा स्थल समाज में सौहार्द की मिश्री घोल रही है.

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