‘बेटी ही सबसे बड़ा दहेज’, औरंगाबाद अधिवक्ता संघ की संगोष्ठी में दहेज मुक्त भारत बनाने पर जोर

Aurangabad Dowry Free India : औरंगाबाद अधिवक्ता संघ में ‘दहेज मुक्त भारत’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित हुई. वक्ताओं ने दहेज प्रथा को सामाजिक अभिशाप बताते हुए युवाओं से दहेज मुक्त विवाह को बढ़ावा देने और समाज में जागरूकता फैलाने का आह्वान किया.
Aurangabad Dowry Free India : अधिवक्ता संघ, औरंगाबाद में शनिवार को ‘दहेज मुक्त भारत’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता अधिवक्ता संघ के सचिव सिद्धेश्वर विद्यार्थी ने की, जबकि संचालन सहायक सचिव अधिवक्ता सतीश कुमार स्नेही ने किया.
दहेज लेना और देना दोनों अपराध
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए अधिवक्ता संजय सिंह ने कहा कि दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज लेना और देना दोनों दंडनीय अपराध हैं. उन्होंने कहा कि दहेज प्रथा एक सामाजिक अभिशाप है और इसे समाप्त करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवाओं की है. उन्होंने कहा कि पारिवारिक विवादों की बड़ी वजह भी दहेज प्रथा बन चुकी है.
‘बेटी ही सबसे बड़ा दहेज’
अध्यक्षीय संबोधन में सिद्धेश्वर विद्यार्थी ने कहा, “दे दिया घर का दीया, फिर भी कहते क्या दिया.” उन्होंने कहा कि बेटी ही सबसे बड़ा दहेज है. कई परिवार बेटियों की शादी के लिए कर्ज लेते हैं या जमीन बेच देते हैं, जबकि दूसरी ओर शादी की रस्मों में भी बड़ी राशि खर्च कर दी जाती है, जो संसाधनों का दुरुपयोग है.
दहेज मुक्त विवाह से मजबूत होंगे रिश्ते
अधिवक्ता सतीश कुमार स्नेही ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और उनके संस्कारों का मिलन होता है. दहेज मुक्त विवाह से प्रेम, सम्मान, समानता और विश्वास की भावना मजबूत होती है तथा घरेलू कलह, उत्पीड़न और दोबारा दहेज मांगने जैसी समस्याओं की संभावना कम हो जाती है.
अधिवक्ता गिरीजेश नारायण सिंह ने कहा कि दहेज मुक्त विवाह दोनों परिवारों को कर्ज के बोझ से बचाता है और मजबूत पारिवारिक रिश्तों की नींव रखता है. इससे लड़की और उसके परिजन तनावमुक्त होकर विवाह का आनंद ले सकते हैं. संगोष्ठी में बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने भाग लिया और दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए समाज में व्यापक जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया.
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